भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ६० ) स्वयं प्रकाश संविद् मे, अहंकार के द्वारा उस प्रकार के दोष का उपपादन संभव नही है। जाति या आकार व्यक्तिगत वस्तु है, जिससे उसकी तदाश्रित प्रतीति होती है, व्यक्ति द्वारा उसकी अभिव्यक्ति नही होती। इसी प्रकार अन्तःकरण भूत अहंकार मे स्थित होने से संवित् की उपलब्धि, वस्तुगत या दोष हेतुक नही है, क्योकि—अहंकार में स्वयं ही ज्ञातृता और उस प्रकार की उपलब्धि का अभाव है। इसलिए स्वयं ज्ञातृरूप से प्रसिद्ध "अहं" पदवाच्य ही जीवात्मा है, "अहं" का अर्थ केवल ज्ञप्ति नही है। अहं भाव के अभाव मे तो ज्ञप्ति की भी जीवात्मता सिद्ध नही हो सकती। तमोगुणाभिभवात् परागर्थानुभवाभावाच्चाहमर्थस्य विविक्त स्फुट प्रतिभासाभावेऽप्याप्रबोधादहमित्येकाकारेणात्मनः स्फुरणात् सुषुप्तावपि नाहम्भावविगमः। भवदभिमता या अनुभूतेरपि तथैव प्रथेति वक्तव्यम् । सुषुप्ति अवस्था मे तमोगुण से अभिभूत होने तथा किसी भी बाह्य पदार्थ की प्रतीत न होने से, अहम्भाव की सुस्पष्ट प्रतीति नही होती यह दूसरी बात है, पर अहं का एकदम लोप ही हो जाता हो, ऐसा नही है, जागरण होने तक अह आकार वाली आत्मस्फूर्त्ति रहती है। तुम्हे भी स्वाभिमत ( आत्मारूप से स्वीकृत ) अनुभूति के ऐसे स्फुरण को स्वीकारना होगा। न हि सुप्तोत्थितः काश्चिदहंभाववियुक्ताथर्न्तरप्रत्यनीकाकारा ज्ञप्तिरहमज्ञानसाक्षितयाऽवतिष्ठत इत्येवंविधां स्वापसमकालानुभूतिं परामृशति। एवं हि सुप्तोत्थितस्य परामर्शः सुखमहमस्वाप्समिति अनेन प्रत्यवमर्शेन तदानीमप्यहमर्थस्यैवात्मनः सुखित्वं ज्ञातृत्वं च ज्ञायते। कोई भी व्यक्ति सोकर उठने पर ऐसा नहीं सोचता कि—"अहं- भाव या अन्य पदार्थों के सम्बन्ध से रहित हूं" अर्थात् ज्ञातृ ज्ञेय आदि विशेष भावों से रहित, ज्ञान स्वरूप वाला मैं, अज्ञान के साक्षी रूप से