श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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नीय अज्ञान के स्वरूप का निरूपण दुर्बोध है, इसे आगे बतलावेंगे। ज्ञान के प्रागभाव रूप अज्ञान को ज्ञानोत्पत्ति का प्रतिबंधक नही कह सकते, इसलिए अज्ञान द्वारा ज्ञान का निराकरण भी साध्य नही है। इसलिए किसी भी प्रकार अहंकार को, अनुभूति का अभिव्यंजक नही कह सकते। न च स्वाश्रयतयाभिव्यंग्याभिव्यंजनमभिव्यंजकानां स्वभावः, प्रदीपादिष्वदर्शनात्। यथावस्थितपदार्थ प्रतीत्यनुगुणस्वाभाव्याच्च ज्ञानतत्साधनयोरनुग्राहकस्य च। तच्च स्वतः प्रामाण्य न्यायसिद्धम्। यह भी नही कह सकते कि—अभिव्यंजक पदार्थों का यह स्वा- भाविक गुण है कि, वे, स्वाश्रित अभिव्यंग्य वस्तु की ही अभिव्यक्ति करते है। प्रदीपादि मे तो ऐसा गुण देखा नही जाता। ज्ञान और ज्ञान की साधक अनुकूल वस्तुओ का तो ऐसा स्वाभाविक गुण होता है कि, वह, यथार्थवस्तु की प्रतीति मे सहायक होती है। यह, स्वतः प्रामाण्य की, न्यायसिद्धबात है। न च दर्पणादि मुखादेरभिव्यंजकः, अपितु चाक्षुषतेजः प्रति फलं न रूपदोष हेतुः, तद्दोषकृतश्च तत्रान्यथावभासः। अभिव्यंजकस्तु आलोकादिरेव। और न दर्पण आदि, मुख आदि के अभिव्यंजक है, अपितु चाक्षुष तेज ही उस अभिव्यक्ति का कारण है, यदि नेत्र की ज्योति मे किसी प्रकार की विकृति होती है, तो विपरीत अवभास होता है। मुखादि के अभिव्यंजक तो आलोक आदि ही है। न चेह तथाऽहंकारेण संविदि स्वप्रकाशायां तादृशदोषोपपादनं संभवति। व्यक्तेस्तु जातिराकार इति तदाश्रयतया प्रतीतिः, नतु व्यक्ति व्यंग्यत्वात्। अतोऽन्त.करणभूताहंकारस्थतया स वि दुपलब्धेर्व- स्तुतो दोषतो वा न किंचिदिह कारणमिति, नाहंकारस्य ज्ञातृत्वं तथोपलब्धिर्वा। तस्मात्स्वत एव ज्ञातृतया सिद्ध्यन्नहमर्थ एव प्रत्य- गात्मा, न ज्ञप्तिमात्रम्। अहम्भावविनिगमे तु ज्ञप्तेरपि न प्रत्यक्त्व- सिद्धिः इत्युक्तम्।