श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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सो रहा था । अपितु सोकर उठा हुआ व्यक्ति, यही कहता है कि—"मैं बडे सुख से सोया ।" जागने वाले व्यक्ति की इस प्रतीति के आधार पर निश्चित होता है कि—निद्राकाल में भी अहं पदवाची आत्मा की सुख प्रतीति और ज्ञातृता विद्यमान रहती है । न च वाच्यम्, यथेदानीं सुखंभवति, तथा तदानीमस्वाप्स- मित्येष!प्रतिपत्तिरिति, अतद्रूपत्वात्प्रतिपत्तेः । न चाहमर्थस्यात्मनो- ऽस्थिरत्वेन तदानीमहमर्थस्य सुखित्वानुसंधानानुपपत्तिः, यतः सुषुप्तिदशायां प्रागनुभूतंवस्तु सुप्तोत्थितो—"मयेदंकृतं मयेदमनुभूतम- हमेतदवोचम्" इति परामृशति "एतावंतंकालं न किंचिदहमज्ञा- सिषम्" इति च परामृशतीति चेत्; ततः किम् ? न किंचिदिति- कृत्स्न प्रतिषेध इति चेत् न, नाहमवेदिषमितिवेदितुरहमर्थस्यैवानुवृत्तेः वेद्यविषयो हि स प्रतिषेधः । न किंचिदिति निषेधस्य कृत्स्न विषयत्वे भवदभिमतानुभूतिरपि प्रतिषिद्धास्यात् । सुसुप्तिसमयेत्वनुसंधीय मानमहमर्थमात्मानं ज्ञातारमहमिति परामृश्य न किंचिदवेदिषमिति वेदने तस्य प्रतिषिध्यमाने तस्मिन काले निषिध्यमानाया वित्तोः सिद्धिमनुवर्त्तमानस्य ज्ञातुरहमर्थस्य चासिद्धिमनेनैव "न किंचिद- हमवेदिषम्" इति परामर्शेन साधयंस्तमिममर्थ देवानामेव साधयतु । यह नहीं कह सकते कि—जागरित अवस्था में जैसा सुख होता है, वैसा निद्रा अवस्था में भी हुआ होगा, ऐसी अनुभूति मात्र होती है ( स्मृति नहीं ) सो यह प्रतीति का स्वरूप नहीं है, ( स्मृति का ही है ) और न यही कह सकते हैं कि--अहं पदार्थ आत्मा ही जब क्षणभगुर है, तब जागने के बाद उसे सुख की स्मृति हो ही कैसे सकती है ? सो सोकर उठा हुआ व्यक्ति सोने के पूर्व जिन वस्तुओं की अनुभूति किये रहता है, उन्हें ही "मैंने ही अमुक कार्य किया था--मैंने ऐसा अनुभव किया था— मैंने ही अमुक बात कही थी" विचार करता है । यदि कहो कि-"मैंने अब तक कुछ भी नहीं जाना" ऐसा परामर्श भी तो करता है तो क्या इस परामर्श से उक्त परामर्श की बात कट जायगी ? यदि कहो कि "मैंने अब ankurnagpal108@gmail.com