श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) तक कुछ भी नहीं जाना'' इस परामर्श का तात्पर्य "कुछ नही जानता" ऐसा निषेधात्मक है, सो बात नहीं है, अपितु उक्त परामर्श करने वाला ज्ञाता, अहं पदार्थ की ही अनुवृत्ति है, इसलिए उक्त परामर्श केवल ज्ञेय विषयक ही है, सर्वविषयक नहीं । सर्वविषयक मानने से तो तुम्हारी अभिमत अनुभूति का ही प्रतिषेध हो जायगा । अर्थात् सुषुप्ति के समय ज्ञाता आत्मा को अहं पद वाची मानकर "मैने कुछ नही जाना" इस परामर्श से यदि उसी अह पदार्थ का प्रतिषेध स्वीकारोगे तो तुम्हारे स्वाभिमत निराकृत ज्ञान के अनुगत अनुभूति स्वरूप आत्मा का भी प्रतिषेध हो जायगा आपका उक्त कथन तो ( मिट्टी के ) देवताओ के समक्ष ही शोभित हो सकता है ( जो कि—उत्तर नही दे सकते) मामप्यहं न ज्ञातवानित्यहमर्थस्यापि तदानीमननुसंधानं प्रतीयत इति चेत्, स्वानुभवस्ववचनयोर्विरोधमपि न जानंति भवन्तः । अहं मा न ज्ञातवानितिहि अनुभववचने । मामिति किं निषिध्यत इति चेत्, साधुपृष्टं भवता । तदुच्यते-अहमर्थस्य ज्ञातुरनुवृत्तेर्न स्वरूपं निषिध्यते, अपि तु प्रबोध समयेऽनुसंधीयमानस्य अहमर्थस्य वर्णा- श्रमादि विशिष्टता । अहं मां न ज्ञातवानित्युक्ते विषयोविवेचनीयः । जागरितावस्थानुसंहितजात्यादिविशिष्टो अस्मदर्थो मामित्यंशस्य विषयः । स्वाप्यावस्थाप्रसिद्धाविशदस्वानुभवैकतानश्चाहमर्थोऽ- हमित्यंशस्य विषयः । अत्र सुप्तोऽहं ईदृशोऽहमिति च मामपि न ज्ञातवानहमित्येव खल्वनुभवप्रकारः । यदि कहो कि—सुषुप्ति के समय "अपने को भी मै नही जान सका" इस कथन मे तो अह पदार्थ आत्मा की प्रतीति का अभाव भी प्रतीति होता है ? ( उत्तर ) वाह ! आप अपने अनुभव और उक्ति के विरोध को भी नही समझते, "मै अपने को भी न जान सका" इस कथन में अनुभव और उसकी अभिव्यंजक उक्ति ही है ( अर्थात् यदि अहं पदार्थ आत्मा न होता तो "न जान सका" ऐसी अनुभूति की बात कैसे कहता ) यदि कहो कि—फिर "माम्" से किसका निषेध किया गया है ? (उत्तर) यह तो आपने अच्छा प्रश्न किया ? सुनिये—सुषुप्ति दशा में अहं पद