भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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वाच्य ज्ञाता की अनुवृत्ति रहती है, इसलिए उसके स्वरूप का निषेध नहीं हो सकता, अपितु जागरित दशा में वर्णाश्रम आदि विशेष धर्मों की जो प्रतीति होती है, सुषुप्ति में उन्हीं का अभाव हो जाता है। "मैं स्वयं को न जान सका" इस उक्ति का विषय विवेचनीय है। जागरितावस्था में अनुभूत जाति वर्णाश्रम आदि धर्म युक्त अहं पदवाच्य आत्मा ही "माम्" अंश का विषय है, तथा निद्रावस्था में प्रसिद्ध अस्फुट अनुभवमात्रगम्य "अहं" पदार्थ ही "अहं" अंश का विषय है। इसलिए उक्त उक्ति में "मैं सोया", मैं ऐसा हूँ, "मुझे भी भान न हुआ" इतने प्रकार के अनुभव निहित है। किंच सुषुप्तावात्माऽज्ञानसाक्षित्वेनास्त इति हि भवदीया प्रक्रिया। साक्षित्वंच साक्षाज्ज्ञातृत्वमेव। न हि अजानतः साक्षित्वम्। ज्ञातैव हि लोकवेदयोः साक्षीति व्यपदिश्यते, न ज्ञानमात्रम्। स्मरति च भगवान् पाणिनिः "साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम्" इति साक्षा- ज्ज्ञातर्येव साक्षिशब्दम्। स चायं साक्षी जानामीति प्रतीयमानोऽस्मदर्थ एवेति कुतस्तानीमहमर्थो न प्रतीयेत। आत्मने स्वयमवभासमानो ऽहमित्येवावभासत इति स्वाप्याद्यवस्थास्वप्यात्मा प्रकाशमानो ऽहमित्येवावभासत इति सिद्धम्। आत्मा सुप्तावस्था में अज्ञान के साक्षी के रूप में रहता है ऐसा आपको अभिमत है। साक्षात् ज्ञातृत्व ही साक्षित्व है, अज्ञातवस्तु का साक्षित्व संभव नहीं है। ज्ञातवस्तु को ही लोक और वेद में साक्षी कहा जाता है, केवल ज्ञान को साक्षी नहीं कहते। जैसा कि भगवान पाणिनि "साक्षाद् दृष्टरि संज्ञायाम्" सूत्र में साक्षात् दृष्टा की साक्षी का ही निर्देश करते हैं। "मैं जानता हूँ" ऐसी प्रतीति रूप साक्षी अस्मत् पदार्थ (आत्मा) के अतिरिक्त किसी और की नहीं है, इसलिए सुप्तावस्था में "अहं" अर्थ की प्रतीति क्यों न होगी ? स्वयं प्रकाशमान आत्मा "अहं" रूप में ही अवभासित होता है, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में, सोने वाला आत्मा, प्रकाशमान "अहं" के रूप में ही अवभासित होता है। यत्तु मोक्षदशायां अहमर्थो नानुवर्त्तते इति, तदपेशलम्। तथा सत्यात्मनाशएवापवर्गः प्रकारान्तरेण प्रतिज्ञातः स्यात्। न च ankurnagpal108@gmail.com