भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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ननु व्यावहारिक प्रमाणप्रमेयव्यवहारो अस्माकमपि अस्ति एव; कोऽयं व्यावहारिक नाम ? आपात् प्रतीतिसिद्धो युक्तिभिर्निरु- पितो न तथावस्थित इति चेत्; किंतेन प्रयोजनं ? प्रमाणतया प्रतिपन्नेऽपि यौक्तिकबाधादेव प्रमाणकार्याभावात् । अथोच्येत- शास्त्र-प्रत्यक्षयोः द्वयोरप्यविद्यामूलत्वेऽपि प्रत्यक्षविषयस्य शास्त्रेण बाधोदृश्यते; शास्त्रविषयस्य सद्वितीयब्रह्मणः पश्चात्तनबाधा- दर्शनेन निर्विशेषानुभूतिमानं ब्रह्मैव परमार्थः इति । तदयुक्तम् अवा- धितस्यापि दोषमूलस्यापारमार्थ्यनिश्चयात् । आपके मत में व्यावहारिक प्रमाण प्रमेयभाव तो स्वीकृत ही है, तो आप का वह व्यावहारिक स्वरूप क्या है ? यदि कहें कि—हर प्रकार से प्रतीतिसिद्ध, युक्तियों से जो भलीभाँति निरूपित न हो सके । वाह ! ऐसी वस्तु का प्रयोजन ही क्या है ? जो वस्तु प्रमाण से सिद्ध हो जाय, फिर भी युक्तियों से सिद्ध न हो सके, वस्तुतः वो प्रमाणित नही मानी जायगी । यदि कहें कि—‘‘शास्त्र और प्रत्यक्ष दोनों के अविद्यामूलक होते हुए भी, प्रत्यक्ष विषय का शास्त्र से बाध दिखलाई देता है । शास्त्र विषय के प्रतिपाद्य सत् स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म के विषय में कोई बाधा नहीं दीखती, इसलिए निर्विशेष अनुभूतिमान ब्रह्म ही परमार्थ है ऐसा निश्चित होता है । ‘‘आपका यह कथन भी असंगत है--जो दोषप्रसूत वस्तु है, वह निर्वाध होते हुए भी अपरमार्थ ही मानी जाती है । एतदुक्तं भवति—यथा सकलेतरकाचादिदोष रहित पुरुषां तरागोचरगिरिगुहासु वसतः तैमिरिकजनस्याज्ञातस्वतिमिरस्य सर्वस्य तिमिरदोषाविशेषेण द्विचन्द्रज्ञानमविशिष्टं जायते । न तत्र बाधक प्रत्ययोऽस्तीति न, तन्मिथ्या न भवतीति, तद्विषय भूतं द्विचेदत्वमपि मिथ्यैव । दोषो हि, अयथार्थज्ञानहेतुः । तथा ब्रह्मज्ञानं अविद्या मूलत्वेन बाधतज्ञानरहितमपि स्वविषयेण ब्रह्मणा सह मिथ्यैव इति । भवंति चात्र प्रयोगाः :—‘‘विवाध्यासितं ब्रह्ममिथ्या

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