श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०० ) इत्युक्तेऽपि भयानिवृत्तिदर्शनात् । शास्त्रस्य च दोषमूलत्वं श्रवणवे- लायामेव ज्ञातम् । श्रवणावगतनिखिलभेदोपमर्दिब्रह्मात्मकत्व- विज्ञानाभ्यासरूपत्वात् मननादेः । जो यह कहो कि—शास्त्र दोषमूलक होते हुए भी, प्रत्यक्ष दृष्ट समस्त भेदों का निवारक ज्ञान उत्पन्न करते हैं; सो तो हो नहीं सकता, क्योंकि दोषमूलकता के निश्चित हो जाने पर उसका परत्व बल अकिंचित्कर हो जाता है । जैसे कि—रज्जु में सर्प की भ्रांति होने पर, किसी के द्वारा कहा जाय कि "यह सर्प नहीं है मत डरो" इतना कहने पर भी भय दूर नहीं होता । शास्त्र की दोषमूलकता तो श्रवण के समय ही ज्ञात होती है । शास्त्र श्रवण के बाद संपूर्ण भेदों के उन्मूलक ब्रह्मात्मकत्व ज्ञान के पुनः पुनः अनुशीलन रूप मनन आदि की व्यवस्था ही उक्त बात की पुष्टि करती है । अपि च इदं शास्त्रम्, एतच्चासंभाव्यमानदोषम्; प्रत्यक्षंतु संभाव्यमान दोषमिति केनावगतं त्वया ? नतावत् स्वतःसिद्धा निर्धूतनिखिलविशेषानुभूतिरिममर्थमवगमयति, तस्याः सर्वविषय विरक्तत्वात् शास्त्रपक्षपात विरहाच्च । नाप्यैन्द्रियिकंप्रत्यक्षं, दोष मूलत्वेन विपरीतार्थत्वात् । तन्मूलत्वादेव नान्यान्यपि प्रमाणानि । अतः स्वपक्ष साधन प्रमाणानभ्युपगमात् न स्वाभिमतार्थ सिद्धिः ये शास्त्र, दोषों की संभावना से रहित हैं तथा प्रत्यक्ष प्रमाण में दोष संभाव्य है; यह बात तुम्हें कहाँ से ज्ञात हुई ? स्वयं सिद्ध निर्विशेष अनु- भूति तो उक्त अर्थ बतला नहीं सकती, क्योंकि वह समस्तविषयों से विरक्त है, तथा उसे शास्त्र का कोई पक्षपात भी नहीं है । किसी इन्द्रिय से उक्त बात जानी हो ऐसा भी संभव नहीं है, क्योंकि जब प्रत्यक्ष ज्ञान दोषमूलक ही है, उसकी तो विपरीत ही प्रतीति होगी । अनुमान आदि अन्यान्य प्रमाण सब प्रत्यक्ष सापेक्ष ही होते हैं, अतः उनसे भी जानना कठिन है । तुम्हें अपने उक्त मत के साधन में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए तुम्हारे अभिमत की सिद्धि नही हो सकती ।