भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ६६ ) यदुक्तम्-“दोषमूलत्वेनान्यथासिद्धिंसंभावनाया, सकलभेदावलं बिप्रत्यक्षस्य शास्त्रबाध्यत्वम्” इति। कोऽयं दोषवक्तव्यम्, यन्मूल- तया प्रत्यक्षस्यान्यथासिद्धिः ? अनादिभेदवासनैव हि दोष इति चेत्; भेदवासनाया. तिमिरादिवत् यथावस्थितवस्तु विपरीतज्ञानहेतुत्वं किमन्यत्र ज्ञातपूर्वम् ? अनेनैवशास्त्र विरोधेन ज्ञास्यत इतिचेत्; न अन्योन्याश्रयणात्, शास्त्रस्यनिरस्तनिखिलविशेषवस्तुबोधित्व निश्चये सति भेदवासनाया. दोषत्वनिश्चय, भेदवासनायां दोष- त्व निश्चिते सति शास्त्रस्यनिरस्तनिखिलविशेषवस्तुबोधित्व निश्चय इति । किंच यदि भेदवासनामूलत्वेन प्रत्यक्षस्य विपरीता- र्थत्वं शास्त्रमपि तन्मूलत्वेन तथैव स्यात् । जो यह कहा कि-“दोषमूलक, भ्रम, आशंकापूर्ण, भेदावलंबी समस्त प्रत्यक्ष, शास्त्रबाध्य हैं” तो बतलाइये कि वे दोष कौन से हैं जिनसे प्रत्यक्ष की भ्रातता संभावित होती है ? यदि कहें कि, अनादिभेदवासना ही वह दोष है; ऐसा मानने से तो, नेत्रों के तिमिर आदि दोषों की तरह, भेदवासना भी, प्रकृति वस्तु से विपरीत भान कराने वाली हो जायगी । आपने ऐसी वासना कहीं देखी भी है क्या ? यदि कहो कि-शास्त्र विरोध से ही ऐसी वासना का ज्ञान होता है; सो बात नहीं है, क्योंकि शास्त्र का उससे अन्योन्याश्रय संबंध है । शास्त्र, समस्त विशेषताओं से रहित वस्तु के प्रतिपादक हैं', ऐसा निश्चित होने से भेदवासना दोषपूर्ण निश्चित हो जाती है, तथा भेदवासना की दोषपूर्णता निश्चित होने से, शास्त्र की समस्त विशेषताओं से रहित, वस्तु प्रतिपादकता निश्चित हो जाती है । यदि भेदवासनामूलक होने से ही प्रत्यक्ष की विपरीतार्थता होती है तब तो शास्त्र भी, तन्मूलक होने से वैसे ही सिद्ध हो जावेंगे । अथोच्येत-दोषमूलत्वेऽपि शास्त्रस्य प्रत्यक्षावगत सकलभेद- निरसनज्ञान हेतुत्वेन परत्वात्तत्प्रत्यक्षस्य बाधकम् इति । तन्न दोषमूलत्वेज्ञाते सति परत्वमकिंचित्करम् । रज्जुसर्पज्ञाननिमित्त भयेसति भ्रांतोऽयमिति परिज्ञातेन केनचित् “नायं सर्पो मा भैषीः”