भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 160

( ६८ ) का उत्पादक होने से उसे अहङ्कार कहते हैं, अहंकार शब्द, अभूततद्भाव अर्थ मे “च्वि” प्रत्यय के सयोग से निष्पन्न बतलाया गया है। यह अहंकार ही श्रेष्ठ मनुष्यों के अपमान का हेतु, शास्त्रों में प्रायः गर्व के नाम से हेय रूप से दिखलाया गया है, तस्मात् बाधकापेताऽहंबुद्धिः साक्षात् आत्मगोचरैव । शरीर- गोचरा तु अहं बुद्धिः अविद्यैव । यथोक्तं भगवता पराशरेण— “श्रूयतां चाप्यविद्यान्या; स्वरूपं कुलनन्दन ! अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या” —इति । यदि ज्ञप्तिमात्रमेवात्मा तदाऽनात्मन्यात्माभिमाने शरीरे ज्ञप्तिमात्र प्रतिभासः स्यात् न ज्ञातृत्व प्रतिभासः । तस्मात् ज्ञाताऽ- हमर्थ एवात्मा—यदुक्तम्—“अतः प्रत्यक्ष सिद्धत्वादुक्त न्यायागमा- न्वयात्, अविद्यायोगतश्चात्मा ज्ञाताऽहमितिभासते ।”--“देहेन्द्रि- यमन. प्राणधीभ्योऽनन्य साधन. नित्यो व्यापी प्रतिक्षेत्रमात्मा भिन्न- स्त्वतस्सुखी ।” इति अनन्यसाधन. स्वप्रकाशः । व्यापी अति सूक्ष्मतया सर्वाचेतनांत. प्रवेशन स्वभावः । किसी भी समय जिसकी बाधा न हो सके ऐसी अहं बुद्धि निश्चित ही साक्षात् सबंध से आत्म विषयक है, तथा शरीर विषयक अह बुद्धि अविद्या है। जैसा कि भगवान पराशर ने कहा है—“अनात्म मे जो आत्म बुद्धि होती है, उस अविद्या के स्वरूप को सुनो ।” यदि आत्मा ज्ञप्ति मात्र ही है तो, अनात्म शरीर मे आत्माभिमान के समय केवल ज्ञप्ति की ही प्रतीति होनी चाहिए, ज्ञातृता की प्रतीति नही होनी चाहिए, सो तो होती नही, इससे निश्चय होता है कि—“अहं” पदवाच्य ही ज्ञाता आत्मा है। जैसा कि कहते भी है—“प्रत्यक्ष, न्याय ( युक्ति ) और शास्त्र प्रमाण के अनुसार तथा अविद्यावश, ज्ञाता आत्मा, अहं रूप में ही भासित होता है”—“देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि से पृथक् अनन्य साधन, नित्य और व्यापी आत्मा प्रतिदेह मे भिन्न, स्वभाव से सुखी है ।” यहाँ अनन्य साधन शब्द स्वप्रकाश अर्थ का बोधक है। अतिसूक्ष्म रूप से समस्त जड़ पदार्थों मे जो अनुस्यूत है उसे व्यापी कहते है । ankurnagpal108@gmail.com