श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६७ ) कि—मैं लोकों का सर्जन करूँ”—“क्षर से अतीत और अक्षर स उत्तम होने से ही मैं लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ”—“गुडाकेश ! मैं ही आत्मा हूँ”—ऐसा नहीं है कि—मैं कभी नही था”—“मैं ही समस्त जगत का प्रभव और प्रलय स्थान हूँ”—“मैं ही सबका प्रभव हूँ मुझसे सबका प्रवर्त्तन होता है”—“मैं ही सबको मृत्यु रूपी संसार सागर से पार करने वाला हूँ”—“मैं ही बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ”—मैं सभी प्रतीतों का ज्ञाता हूँ” इत्यादि । यद्यहमित्येवात्मनःस्वरूपम्, कथंतर्हि अहंकारस्य क्षेत्रान्त- र्भावो भगवतोपदिश्यते—“महाभूतान्यहंकारोबुद्धिरव्यक्तमेव च” इति । (संशय)—यदि अहं ही आत्मा का स्वरूप है, तो भगवान ने अहंकार का क्षेत्रान्तर भाव क्यों बतलाया ?“—महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मन” इत्यादि । उच्यते—स्वरूपोपदेशेषुसर्वेष्वहमित्येवोपदेशात् तथैवात्म स्वरूपपतिपत्तेश्च अह्रदित्येव प्रत्यगात्मनः स्वरूपम् । अव्यक्त परिणामभेदस्याहंकारस्य क्षेत्रान्तरभावो भगवतैवोपदिश्यते । स तु नात्मनि देहेऽहंभावकरण हेतुत्वेन अहंकार इत्युच्यते । अस्यतु अहंकार शब्दस्य अभूततद्भावेऽर्थेच्चिवप्रत्ययमुत्पाद्य व्युत्पत्तिर्द्रष्टव्या । अयमेव तु अहंकारः, उत्कृष्टजनावमानहेतुर्गर्वापरनामा शास्त्रेषु बहुशो हेयतया प्रतिपाद्यते । ( समाधान ) —जहाँ जहाँ भी आत्मा के स्वरूप का उपदेश है, वहाँ सभी जगह, अहं रूप से ही आत्मा का निर्देश किया गया है, उसी प्रकार जीवात्मा के स्वरूप के विश्लेषण में जीवात्मा का भी “अहं” स्वरूप बतलाया गया है । अव्यक्त ( प्रकृति ) के परिणाम विशेष अहंकार का क्षेत्रान्तर भाव भगवान ने ही बतलाया है । अनात्म देह में अहम्भाव ankurnagpal108@gmail.com