भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ६६ ) नहीं हो सकता, मोक्ष की स्थिति में अज्ञता संभव नहीं है ) तथा अहं प्रत्यय अज्ञता का हेतु भी नहीं है। स्वरूप का अज्ञान, अन्यथा या विपरीत ज्ञान ही अज्ञान है। अहं प्रत्यय आत्मा का ही स्वरूप है ऐसा स्वरूप- ज्ञान रूपी अहं प्रत्यय, अज्ञानता को प्राप्त नहीं हो सकता, उसमें संसारी- पन कैसे संभव है, अपितु उसका विरोधी होने से वह सांसारिकता का नाश ही करता है। ब्रह्मात्मभावापरोक्ष्यनिर्धूतनिरवशेषाविद्यानामपि वामदेवादि नामहमित्येवात्मानुभवदर्शनाच्च। श्रूयते हि—"तद्वैतत्पश्यन् ऋषि- र्वामदेवः प्रतिपेदे अहं मनुरभवं सूर्यश्च" इति "अहमेकः प्रथममासं वर्त्तामि च भविष्यामि च" इत्यादि। सकलेतराज्ञानविरोधिनः सच्छब्दप्रत्ययमात्रभाजः परस्य ब्रह्मणो व्यवहारोऽप्यमेव—"हन्ताहमि- मास्तिस्रो देवताः—"बहुस्यां प्रजायेय"—स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति"; तथा "यस्मात्क्षरमतीतोऽमक्षरादपि चोत्तमः, अतोऽस्मि लोक वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः"—अहमात्मा गुडाकेश—"नत्वेवाहं जातुनासम्"—अहंकृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्त्तते"—"तेषामहं समुद्धर्त्ता मृत्यु संसार सागरात्"—"अहंबीजप्रदः पिता"—"वेदाहंसमतीतानि" इत्यादिषु । ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति से जिनकी अविद्या निर्मूल हो चुकी थी, ऐसे वामदेव आदि का भी "अहंकार" युक्त अनुभव पाया गया। श्रुति में कहा है कि—"उन वामदेव ऋषि ने तत्त्व दर्शन करके विचार किया कि, मैं ही मनु और सूर्य हुआ था "तथा" मैं ही पहिले था, इस समय हूँ और भविष्य में भी रहूँगा" इत्यादि। अन्यान्य सभी अज्ञानों के विरोधी "सत्" शब्द प्रत्यय से ही ज्ञात परब्रह्म के लिए भी ऐसा ही व्यवहार किया गया है—जैसे—"मैं ही इन तीनों देवताओ का रूप लूं—मैं बहुत होकर जन्म लें—"उसने सोचा ankurnagpal108@gmail.com