श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५ ) यथार्थ में या भ्रान्तिवश जो लोग आध्यात्मिक आदि दुःखों से कातर होकर “मैं दुःखी हूँ” ऐसा अनुभव करते हैं, वे लोग पुनः ये दुःख प्राप्त न हों, कैसे इन दुःखों का नाश कर सकूँ, ऐसा विचार कर मुक्त होने के लिए, मोक्ष प्राप्ति के साधनों में संलग्न होते हैं। उन साधना- नुष्ठानों से यदि उन्हें यह प्रतीति होने लगे कि “मैं ही समाप्त हो जाऊँगा” तो वे लोग ऐसे मोक्ष की बात को सुनकर ही भाग खड़े होंगे इस तरह कोई मोक्ष का अधिकारी दृष्टिगत ही न होगा, सारे मोक्ष के उपदेशक शास्त्र जहाँ के तहाँ रखे रह जावेंगे। यदि कहो कि—मोक्षदशा में ( अहं के नष्ट हो जाने पर भी ) अहंकारोपलक्षित आत्म प्रकाश विद्यमान रहता है। तो इससे क्या होता है ? मैं नष्ट होकर केवल प्रकाशमान रह जाऊँगा, ऐसा जानकर भी कोई बुद्धिमान मोक्ष मार्ग की ओर उन्मुख नहीं हो सकता। इसलिए मानना होगा कि—ज्ञाता रूप से प्रसिद्ध अहं पदार्थ, जीवात्मा ही है। जो कि मुक्ति दशा में भी “अहं” रूप से प्रकाशित रहता है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाश है, जो जो वस्तुएं स्वयं प्रकाश होती हैं वे सब अहं से ही प्रकाशित होती हैं, जैसे कि संसारी आत्मा “अहं” आकार में ही अवभासित होता है, यह बात तो हम आप दोनों को ही स्वीकार्य है। जो अहं रूप से प्रकाशित नहीं होते, वे स्वप्रकाश नहीं हैं, जैसे कि घट आदि जड़ पदार्थ। मुक्तात्मा स्वप्रकाश है, इसका प्रकाश अहं रूप में ही प्रकाशित रहता है। न चाहमिति प्रकाशमानत्वेन तस्याज्ञत्व संसारित्वादि प्रसङ्गः। मोक्षविरोधात् अज्ञत्वाद्यहेतुत्वाच्चाहंप्रत्ययस्य । अज्ञानंनाम स्वरूपाज्ञानमन्यथाज्ञानं विपरीत ज्ञानं वा । अह्मित्येवात्मनः स्वरूप- मिति स्वरूप ज्ञानरूपोऽहंप्रत्ययो नाज्ञत्वमापादयति, कुतः संसारित्वं, अपितु तद् विरोधित्वात् नाशयत्येव । अहंरूप से प्रकाशमान रहने से ( मुक्तात्मा में ) संसारी आत्माओं की सी अज्ञता हो सकती है, ऐसा संशय भी नही कर सकते। मोक्षदशा स्वयं ही अज्ञता की विरोधी स्थिति है ( जब तक अज्ञता है तब तक मोक्ष ankurnagpal108@gmail.com