श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ६७ ) कि—मैं लोकों का सर्जन करूँ”—“क्षर से अतीत और अक्षर स उत्तम होने से ही मैं लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ”—“गुडाकेश ! मैं ही आत्मा हूँ”—ऐसा नहीं है कि—मैं कभी नही था”—“मैं ही समस्त जगत का प्रभव और प्रलय स्थान हूँ”—“मैं ही सबका प्रभव हूँ मुझसे सबका प्रवर्त्तन होता है”—“मैं ही सबको मृत्यु रूपी संसार सागर से पार करने वाला हूँ”—“मैं ही बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ”—मैं सभी प्रतीतों का ज्ञाता हूँ” इत्यादि । यद्यहमित्येवात्मनःस्वरूपम्, कथंतर्हि अहंकारस्य क्षेत्रान्त- र्भावो भगवतोपदिश्यते—“महाभूतान्यहंकारोबुद्धिरव्यक्तमेव च” इति । (संशय)—यदि अहं ही आत्मा का स्वरूप है, तो भगवान ने अहंकार का क्षेत्रान्तर भाव क्यों बतलाया ?“—महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मन” इत्यादि । उच्यते—स्वरूपोपदेशेषुसर्वेष्वहमित्येवोपदेशात् तथैवात्म स्वरूपपतिपत्तेश्च अह्रदित्येव प्रत्यगात्मनः स्वरूपम् । अव्यक्त परिणामभेदस्याहंकारस्य क्षेत्रान्तरभावो भगवतैवोपदिश्यते । स तु नात्मनि देहेऽहंभावकरण हेतुत्वेन अहंकार इत्युच्यते । अस्यतु अहंकार शब्दस्य अभूततद्भावेऽर्थेच्चिवप्रत्ययमुत्पाद्य व्युत्पत्तिर्द्रष्टव्या । अयमेव तु अहंकारः, उत्कृष्टजनावमानहेतुर्गर्वापरनामा शास्त्रेषु बहुशो हेयतया प्रतिपाद्यते । ( समाधान ) —जहाँ जहाँ भी आत्मा के स्वरूप का उपदेश है, वहाँ सभी जगह, अहं रूप से ही आत्मा का निर्देश किया गया है, उसी प्रकार जीवात्मा के स्वरूप के विश्लेषण में जीवात्मा का भी “अहं” स्वरूप बतलाया गया है । अव्यक्त ( प्रकृति ) के परिणाम विशेष अहंकार का क्षेत्रान्तर भाव भगवान ने ही बतलाया है । अनात्म देह में अहम्भाव ankurnagpal108@gmail.com
( ६८ ) का उत्पादक होने से उसे अहङ्कार कहते हैं, अहंकार शब्द, अभूततद्भाव अर्थ मे “च्वि” प्रत्यय के सयोग से निष्पन्न बतलाया गया है। यह अहंकार ही श्रेष्ठ मनुष्यों के अपमान का हेतु, शास्त्रों में प्रायः गर्व के नाम से हेय रूप से दिखलाया गया है, तस्मात् बाधकापेताऽहंबुद्धिः साक्षात् आत्मगोचरैव । शरीर- गोचरा तु अहं बुद्धिः अविद्यैव । यथोक्तं भगवता पराशरेण— “श्रूयतां चाप्यविद्यान्या; स्वरूपं कुलनन्दन ! अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या” —इति । यदि ज्ञप्तिमात्रमेवात्मा तदाऽनात्मन्यात्माभिमाने शरीरे ज्ञप्तिमात्र प्रतिभासः स्यात् न ज्ञातृत्व प्रतिभासः । तस्मात् ज्ञाताऽ- हमर्थ एवात्मा—यदुक्तम्—“अतः प्रत्यक्ष सिद्धत्वादुक्त न्यायागमा- न्वयात्, अविद्यायोगतश्चात्मा ज्ञाताऽहमितिभासते ।”--“देहेन्द्रि- यमन. प्राणधीभ्योऽनन्य साधन. नित्यो व्यापी प्रतिक्षेत्रमात्मा भिन्न- स्त्वतस्सुखी ।” इति अनन्यसाधन. स्वप्रकाशः । व्यापी अति सूक्ष्मतया सर्वाचेतनांत. प्रवेशन स्वभावः । किसी भी समय जिसकी बाधा न हो सके ऐसी अहं बुद्धि निश्चित ही साक्षात् सबंध से आत्म विषयक है, तथा शरीर विषयक अह बुद्धि अविद्या है। जैसा कि भगवान पराशर ने कहा है—“अनात्म मे जो आत्म बुद्धि होती है, उस अविद्या के स्वरूप को सुनो ।” यदि आत्मा ज्ञप्ति मात्र ही है तो, अनात्म शरीर मे आत्माभिमान के समय केवल ज्ञप्ति की ही प्रतीति होनी चाहिए, ज्ञातृता की प्रतीति नही होनी चाहिए, सो तो होती नही, इससे निश्चय होता है कि—“अहं” पदवाच्य ही ज्ञाता आत्मा है। जैसा कि कहते भी है—“प्रत्यक्ष, न्याय ( युक्ति ) और शास्त्र प्रमाण के अनुसार तथा अविद्यावश, ज्ञाता आत्मा, अहं रूप में ही भासित होता है”—“देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि से पृथक् अनन्य साधन, नित्य और व्यापी आत्मा प्रतिदेह मे भिन्न, स्वभाव से सुखी है ।” यहाँ अनन्य साधन शब्द स्वप्रकाश अर्थ का बोधक है। अतिसूक्ष्म रूप से समस्त जड़ पदार्थों मे जो अनुस्यूत है उसे व्यापी कहते है । ankurnagpal108@gmail.com
( ६६ ) यदुक्तम्-“दोषमूलत्वेनान्यथासिद्धिंसंभावनाया, सकलभेदावलं बिप्रत्यक्षस्य शास्त्रबाध्यत्वम्” इति। कोऽयं दोषवक्तव्यम्, यन्मूल- तया प्रत्यक्षस्यान्यथासिद्धिः ? अनादिभेदवासनैव हि दोष इति चेत्; भेदवासनाया. तिमिरादिवत् यथावस्थितवस्तु विपरीतज्ञानहेतुत्वं किमन्यत्र ज्ञातपूर्वम् ? अनेनैवशास्त्र विरोधेन ज्ञास्यत इतिचेत्; न अन्योन्याश्रयणात्, शास्त्रस्यनिरस्तनिखिलविशेषवस्तुबोधित्व निश्चये सति भेदवासनाया. दोषत्वनिश्चय, भेदवासनायां दोष- त्व निश्चिते सति शास्त्रस्यनिरस्तनिखिलविशेषवस्तुबोधित्व निश्चय इति । किंच यदि भेदवासनामूलत्वेन प्रत्यक्षस्य विपरीता- र्थत्वं शास्त्रमपि तन्मूलत्वेन तथैव स्यात् । जो यह कहा कि-“दोषमूलक, भ्रम, आशंकापूर्ण, भेदावलंबी समस्त प्रत्यक्ष, शास्त्रबाध्य हैं” तो बतलाइये कि वे दोष कौन से हैं जिनसे प्रत्यक्ष की भ्रातता संभावित होती है ? यदि कहें कि, अनादिभेदवासना ही वह दोष है; ऐसा मानने से तो, नेत्रों के तिमिर आदि दोषों की तरह, भेदवासना भी, प्रकृति वस्तु से विपरीत भान कराने वाली हो जायगी । आपने ऐसी वासना कहीं देखी भी है क्या ? यदि कहो कि-शास्त्र विरोध से ही ऐसी वासना का ज्ञान होता है; सो बात नहीं है, क्योंकि शास्त्र का उससे अन्योन्याश्रय संबंध है । शास्त्र, समस्त विशेषताओं से रहित वस्तु के प्रतिपादक हैं', ऐसा निश्चित होने से भेदवासना दोषपूर्ण निश्चित हो जाती है, तथा भेदवासना की दोषपूर्णता निश्चित होने से, शास्त्र की समस्त विशेषताओं से रहित, वस्तु प्रतिपादकता निश्चित हो जाती है । यदि भेदवासनामूलक होने से ही प्रत्यक्ष की विपरीतार्थता होती है तब तो शास्त्र भी, तन्मूलक होने से वैसे ही सिद्ध हो जावेंगे । अथोच्येत-दोषमूलत्वेऽपि शास्त्रस्य प्रत्यक्षावगत सकलभेद- निरसनज्ञान हेतुत्वेन परत्वात्तत्प्रत्यक्षस्य बाधकम् इति । तन्न दोषमूलत्वेज्ञाते सति परत्वमकिंचित्करम् । रज्जुसर्पज्ञाननिमित्त भयेसति भ्रांतोऽयमिति परिज्ञातेन केनचित् “नायं सर्पो मा भैषीः”
( १०० ) इत्युक्तेऽपि भयानिवृत्तिदर्शनात् । शास्त्रस्य च दोषमूलत्वं श्रवणवे- लायामेव ज्ञातम् । श्रवणावगतनिखिलभेदोपमर्दिब्रह्मात्मकत्व- विज्ञानाभ्यासरूपत्वात् मननादेः । जो यह कहो कि—शास्त्र दोषमूलक होते हुए भी, प्रत्यक्ष दृष्ट समस्त भेदों का निवारक ज्ञान उत्पन्न करते हैं; सो तो हो नहीं सकता, क्योंकि दोषमूलकता के निश्चित हो जाने पर उसका परत्व बल अकिंचित्कर हो जाता है । जैसे कि—रज्जु में सर्प की भ्रांति होने पर, किसी के द्वारा कहा जाय कि "यह सर्प नहीं है मत डरो" इतना कहने पर भी भय दूर नहीं होता । शास्त्र की दोषमूलकता तो श्रवण के समय ही ज्ञात होती है । शास्त्र श्रवण के बाद संपूर्ण भेदों के उन्मूलक ब्रह्मात्मकत्व ज्ञान के पुनः पुनः अनुशीलन रूप मनन आदि की व्यवस्था ही उक्त बात की पुष्टि करती है । अपि च इदं शास्त्रम्, एतच्चासंभाव्यमानदोषम्; प्रत्यक्षंतु संभाव्यमान दोषमिति केनावगतं त्वया ? नतावत् स्वतःसिद्धा निर्धूतनिखिलविशेषानुभूतिरिममर्थमवगमयति, तस्याः सर्वविषय विरक्तत्वात् शास्त्रपक्षपात विरहाच्च । नाप्यैन्द्रियिकंप्रत्यक्षं, दोष मूलत्वेन विपरीतार्थत्वात् । तन्मूलत्वादेव नान्यान्यपि प्रमाणानि । अतः स्वपक्ष साधन प्रमाणानभ्युपगमात् न स्वाभिमतार्थ सिद्धिः ये शास्त्र, दोषों की संभावना से रहित हैं तथा प्रत्यक्ष प्रमाण में दोष संभाव्य है; यह बात तुम्हें कहाँ से ज्ञात हुई ? स्वयं सिद्ध निर्विशेष अनु- भूति तो उक्त अर्थ बतला नहीं सकती, क्योंकि वह समस्तविषयों से विरक्त है, तथा उसे शास्त्र का कोई पक्षपात भी नहीं है । किसी इन्द्रिय से उक्त बात जानी हो ऐसा भी संभव नहीं है, क्योंकि जब प्रत्यक्ष ज्ञान दोषमूलक ही है, उसकी तो विपरीत ही प्रतीति होगी । अनुमान आदि अन्यान्य प्रमाण सब प्रत्यक्ष सापेक्ष ही होते हैं, अतः उनसे भी जानना कठिन है । तुम्हें अपने उक्त मत के साधन में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए तुम्हारे अभिमत की सिद्धि नही हो सकती ।
ननु व्यावहारिक प्रमाणप्रमेयव्यवहारो अस्माकमपि अस्ति एव; कोऽयं व्यावहारिक नाम ? आपात् प्रतीतिसिद्धो युक्तिभिर्निरु- पितो न तथावस्थित इति चेत्; किंतेन प्रयोजनं ? प्रमाणतया प्रतिपन्नेऽपि यौक्तिकबाधादेव प्रमाणकार्याभावात् । अथोच्येत- शास्त्र-प्रत्यक्षयोः द्वयोरप्यविद्यामूलत्वेऽपि प्रत्यक्षविषयस्य शास्त्रेण बाधोदृश्यते; शास्त्रविषयस्य सद्वितीयब्रह्मणः पश्चात्तनबाधा- दर्शनेन निर्विशेषानुभूतिमानं ब्रह्मैव परमार्थः इति । तदयुक्तम् अवा- धितस्यापि दोषमूलस्यापारमार्थ्यनिश्चयात् । आपके मत में व्यावहारिक प्रमाण प्रमेयभाव तो स्वीकृत ही है, तो आप का वह व्यावहारिक स्वरूप क्या है ? यदि कहें कि—हर प्रकार से प्रतीतिसिद्ध, युक्तियों से जो भलीभाँति निरूपित न हो सके । वाह ! ऐसी वस्तु का प्रयोजन ही क्या है ? जो वस्तु प्रमाण से सिद्ध हो जाय, फिर भी युक्तियों से सिद्ध न हो सके, वस्तुतः वो प्रमाणित नही मानी जायगी । यदि कहें कि—‘‘शास्त्र और प्रत्यक्ष दोनों के अविद्यामूलक होते हुए भी, प्रत्यक्ष विषय का शास्त्र से बाध दिखलाई देता है । शास्त्र विषय के प्रतिपाद्य सत् स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म के विषय में कोई बाधा नहीं दीखती, इसलिए निर्विशेष अनुभूतिमान ब्रह्म ही परमार्थ है ऐसा निश्चित होता है । ‘‘आपका यह कथन भी असंगत है--जो दोषप्रसूत वस्तु है, वह निर्वाध होते हुए भी अपरमार्थ ही मानी जाती है । एतदुक्तं भवति—यथा सकलेतरकाचादिदोष रहित पुरुषां तरागोचरगिरिगुहासु वसतः तैमिरिकजनस्याज्ञातस्वतिमिरस्य सर्वस्य तिमिरदोषाविशेषेण द्विचन्द्रज्ञानमविशिष्टं जायते । न तत्र बाधक प्रत्ययोऽस्तीति न, तन्मिथ्या न भवतीति, तद्विषय भूतं द्विचेदत्वमपि मिथ्यैव । दोषो हि, अयथार्थज्ञानहेतुः । तथा ब्रह्मज्ञानं अविद्या मूलत्वेन बाधतज्ञानरहितमपि स्वविषयेण ब्रह्मणा सह मिथ्यैव इति । भवंति चात्र प्रयोगाः :—‘‘विवाध्यासितं ब्रह्ममिथ्या
( १०२ ) अविद्यावत् उत्पन्न ज्ञानविषयत्वात् प्रपंचवत् “ब्रह्मज्ञानविषयत्वात् प्रपंचवत्” ! ब्रह्ममिथ्या असत्यहेतुजन्य ज्ञान विषयत्वात् प्रपंचवदेव । कथन यह है कि--जैसे, समस्त नेत्र रोग विहीन, पर्वत गुहावासी कोई व्यक्ति, गुहा के घोर अंधकार में निरन्तर रहने के कारण तिमिर रोग (रतौंधी) से ग्रस्त हो जाता है; पर अपने उस रोग को नहीं जान पाता उसके लिए वह सामान्य सी बात है; उस व्यक्ति को दो चन्द्र दिखलाई देते है, उसके लिए उस जानकारी में वहाँ कोई बाधक ज्ञान भी नहीं है (क्योंकि उसे गुहा के अतिरिक्त बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं होता) इसलिए वह अपने द्विचन्द्र ज्ञान को मिथ्या नहीं मानता; पर उसका वह ज्ञान है तो मिथ्या ही । दोष तो तभी हो, जब कि वह अयथार्थ ज्ञान हेतुक हो । इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान अविद्या मूलक होने से बाधक के न रहते हुए भी ब्रह्म ज्ञान सहित मिथ्या ही है । ऐसे प्रयोग भी किये जाते हैं—“ब्रह्म, मिथ्या ज्ञान का विषय होने के कारण, प्रपंचमय जगत की तरह मिथ्या है--“जो विवा दास्पद है वह ब्रह्म मिथ्या है”--“असत्य के हेतु शास्त्र ज्ञान का विषय होने के कारण, प्रपंचमय जगत की तरह, ब्रह्म मिथ्या है ।” (इत्यादि चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि कहते हैं) । न च वाच्यं स्वाप्नस्य हस्त्यादिविज्ञानस्यासत्यस्य परमार्थ शुभाशुभप्रतिपत्ति हेतु भाववदविद्यामूलत्वेनासत्यस्यातिशास्त्रस्य परमार्थभूतब्रह्मविषयप्रतिपत्तिहेतुभावो न विरुद्धः इति । स्वप्नज्ञान स्यासत्यत्वाभावात् । तत्र हि विषयाणामेव मिथ्यात्वम् तेषामेव हि बाधोदृश्यंते, न ज्ञानस्य, न हि मया स्वप्नवेलायामनुभूत ज्ञानमपि न विद्यत इति, कस्यचिदपि प्रत्ययो जायते । दर्शनं तु विद्यते, अर्था न संतीति हि बाधक प्रत्ययः । मायाविनो मंत्रौषधादिप्रभवं मायामयं ज्ञानं सत्यमेवप्रीतिर्भयस्य च हेतुः । तत्रापि ज्ञानस्य अबाधितत्वात् विषयेन्द्रियादि दोषजन्यं रज्ज्वादौ सर्पादिविज्ञानं सत्यमेव, भयादि हेतुः । सत्येवादष्टेऽपि स्वात्मनि सर्पसन्निधानात् दष्ट बुद्धिः सत्यैव ankurnagpal108@gmail.com
( १०३ ) शंकाविषबुद्धिर्मरण हेतुभूता । वस्तुभूत एव जलादौ मुखादि प्रति- भासो वस्तुभूत मुखगत विशेष निश्चय हेतुः । एषां संवेदनानां उत्प- त्तिमत्वात् अर्थक्रियाकारित्वाच्च सत्यत्वमवसीयते । हस्त्यादी- नां अभावेऽपिकथं तद्बुद्धयः सत्याभवंतीति चेत् नैतत् बुद्धीनां सालम्बनत्वमात्र नियमात् । यह नहीं कह सकते किं—“स्वप्न में दृष्ट, हस्ति आदि ज्ञान, असत्य होते हुए भी, शुभाशुभ वास्तविक फलदायी होते हैं, उसी प्रकार अविद्या मूलक असत्य होते हुए भी, शास्त्र का ब्रह्मविषयक फल वास्तविक ही होता है । “स्वाप्न ज्ञान असत्य नहीं होता, अपितु स्वप्न में देखे गए पदार्थ ही मिथ्या होते हैं क्योंकि जागने पर वे दीखते नहीं ऐसा तो कोई नहीं कह सकता कि, स्वप्न में मुझे प्रतीति नहीं हुई । स्वप्न में दीखता तो निश्चय ही है, पर स्वप्नदृष्ट विषय नहीं होते यही बाधकता है । मायावी (जादूगर) मंत्र और औषधि के प्रभाव से जो चमत्कार दिखलाता है, वह प्रीति और भयोत्पादक होता है, वह ज्ञान भी सत्य है क्योंकि वह ज्ञान भी अबाधित होता है । विषय और इन्द्रियादि जन्य रस्सी में होने वाली सर्प प्रतीति भी भयोत्पादक होने के कारण सत्य ही है, उस रस्सी रूपी सर्प से दंशित न होते हुए भी, दंशन का भय तो होता ही है, क्योंकि- उसमें मरण के हेतु विष की शंका रहती है । जल दर्पण आदि में मुख आदि का जो प्रतिबिम्ब दीखता है, वह मुखगत वास्तविकता का निर्णा- यक होता है । इस प्रकार की प्रतीतियों में उत्पत्तिशीलता और कार्य संपादन शक्ति होने से सत्यता निश्चित होती है । यदि कहो कि-“स्वप्न दृष्ट हस्ति आदि जब रहते नहीं तो तद्विषयक बुद्धि ही कैसे सत्य हो सकती है ?” बुद्धि को तो एक अवलम्बन चाहिए, वह तो वस्तु के प्रति- भासित होने मात्र से उस पर आधारित हो जाती है । अर्थस्य प्रतिभासमानत्वमेव हि आलम्बनत्वेऽपेक्षितम्, प्रति भासमानता च अस्त्येव दोषवशात् । सतु बाधितोऽसत्य इत्यवसी- यते अबाधिता हि बुद्धिः सत्यैवेत्युक्तम् । हस्ति आदि विषय की प्रतीति होती तो है ही, क्योंकि वह आलम्बन सापेक्ष होती है, इसलिए उसकी प्रतिभासमानता होती है । जागने पर ankurnagpal108@gmail.com
( १०४ ) उस प्रतीतिगत वस्तु की असत्यता ज्ञात हो जाती है, पर उस प्रतीति बुद्धि का तो बाध होता नहीं, इसलिए उसे तो सत्य ही कहना होगा। रेखायावर्णप्रतिपत्तावपि नासत्यात्सत्यबुद्धिः, रेखायास्सत्यत्वात् ननु वर्णात्मनाप्रतिपन्नारेखा वर्णबुद्धिहेतुः, वर्णात्मतात्वसत्या । मैवम् वर्णात्मताया असत्याया उपायत्वायोगात्। असतो निरूपा- ख्यस्य हि उपायत्वं न दृष्टमनुपपन्नं च । अथतस्या वर्णबुद्धे रुपाय- त्वं एवंतर्हि असत्यात् सत्यबुद्धिर्नस्यात् बुद्धेः सत्यत्वादेव । उपायो पेययोरेकत्वप्रसंगश्च उभयोर्वर्णबुद्धित्वाविशेषात् । रेखाया अविद्य मानवर्णात्मनोपायत्त्वे चैकस्यामेव रेखायामविद्यमानसर्ववर्णात्मक त्वस्य सुलभत्वादेकरेखादर्शनात्सर्ववर्णप्रतिपत्तिस्स्यात् । रेखाओं से जो वर्ण बनते हैं उनमें भी सत्यता की ही प्रतीति होती है असत्यता से सत्य बुद्धि नहीं होती, क्योंकि रेखायें तो सत्य हैं हीं। रेखा वर्ण का स्वरूप मानकर ही रेखा में वर्णबुद्धि होती है, वस्तुतः रेखा तो वर्ण है नहीं ऐसा संशय भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि—यदि रेखा की वर्णात्मकता को असत्य मान लेगें तो, वह वर्ण बोध की उपाय नहीं रह जायगी असत् वस्तु की निरूपण शक्ति और उपायता कहीं भी देखी नहीं जाती और न होती ही है। यदि रेखा में होने वाली वर्णबुद्धि को ही वर्ण बोध का उपाय मान लें तो, बुद्धि तो सत्य ही है, फिर असत्य से सत्य बुद्धि हो रही है, ऐसा नहीं कह सकते। साथ ही रेखा और वर्ण दोनों में ही वर्णबुद्धिता मानने से, उपाय और उपेय दोनों एक हो जावेंगे। रेखा यदि वस्तुतः वर्णात्मक न होकर केवल उपाय मात्र ही हैं तो, प्रत्येक रेखा से, सारी वर्णमाला का सरलता से ज्ञान हो जाना चाहिए, तथा एक ही रेखा को देखने से वर्णमाला की प्रतीति हो जाती चाहिए। सो तो होती नहीं। अर्थपिण्डविशेषे देवदत्तादिशब्द संकेतवत् चक्षुग्राह्यरेखा विशेषे श्रोत्रग्राह्यवर्णविशेषोसंकेतवशाद् रेखाविशेष वर्णविशेष बुद्धि हेतुरिति । हन्त तर्हि सत्यादेव सत्यप्रतिपत्तिः रेखायाः संकेत ankurnagpal108@gmail.com
( १०५ ) स्य च सत्यसत्त्वात् । रेखागवयादपि सत्यगवयबुद्धिः सादृश्यनि बंधना सादृश्यं च सत्यमेव । यदि कहो कि--पिंडविशेष मे जैसे देवदत्त आदि शब्द का संकेत किया जाता है वैसे ही चक्षु ग्राह्य रेखा विशेष में श्रोत्र ग्राह्यवर्ण विशेष के संकेत से, रेखा विशेष मे वर्ण विशेष की बुद्धि होती है । ठीक है, यह तो सत्य से ही सत्य की प्रतीति हुई, क्योकि रेखा और संकेत दोनो ही सत्य है । रेखा (चित्रित) गाय में भी, सत्य गाय की बुद्धि, सादृश्य के कारण होती है, सादृश्य तो सत्य है ही । न चैकरूपस्य शब्दस्य नादविशेषेणार्थ भेदबुद्धि हेतुत्वेऽप्यसत्या त्सत्यप्रतिपत्तिः नानानादाभिव्यक्तस्यैकस्यैव शब्दस्य तत्तन्नादाभि व्यंग्यस्वरूपेणार्थविशेषैः सह संबंधग्रहणवशात् अर्थभेदबुद्धि उत्पत्ति हेतुत्वात् । शब्दस्यैकरूपत्वमपि न साधीयः, गकारादेवोधकस्यैव श्रोत्राग्राह्यत्वेन शब्दत्वात् । अतोऽसत्यात् शास्त्रात् सत्यब्रह्म विषय प्रतिपत्तिर्दु रुपपादा । एक आकार के शब्द की, उच्चारण के भेद से विभिन्न अर्थगत भेद बुद्धि होती है, इसलिए असत्य से सत्य बुद्धि होती हो सो भी नही है, क्योंकि--एक ही शब्द अनेकों ध्वनियों के अनुसार अभिव्यक्त होकर उन ध्वनियों में अभिव्यंजित होकर भिन्न-भिन्न अर्थो से संबंध, भिन्न-भिन्न विषयों की प्रतीति कराता है । अर्थ बोधक ग आदि वर्ण जब श्रवणे- न्द्रिय ग्राह्य होते हैं, तभी शब्द कहलाते हैं, इसलिए विभिन्न वर्णमय शब्दों की एक रूपता भी युक्ति संगत नही है । उक्त दृष्टान्तों से सिद्ध होता है कि--असत्य शास्त्र से सत्य स्वरूप ब्रह्म की सिद्धि करना कठिन है । ननु न शास्त्रस्य गगनकुसुमवत् असत्यत्वम् । प्रागद्वैतज्ञानात् सद्बुद्धिबोध्यत्वात् । उत्पन्ने तत्त्वज्ञाने हि असत्यत्वं शास्त्रस्य । न तदा शास्त्रं निरस्तनिखिलभेदचिन्मात्रब्रह्मज्ञानोपायः । यदोपायः ankurnagpal108@gmail.com
( १०६ )
तदा अस्त्येव शास्त्रम् अस्तीति बुद्धेः । नैवम्, असति शास्त्रे, अस्ति शास्त्रमिति बुद्धेर्मिथ्यात्वात् । ततः किम् ? इदं ततः मिथ्या भूत शास्त्रजन्यज्ञानस्य मिथ्यात्वेन तद्विषयस्यापि ब्रह्मणो मिथ्या त्वम्, यथा धूमबुद्धयागृहीत वाष्पजन्याग्निज्ञानस्य मिथ्यात्वेन तद् विषयस्याग्नेरपि मिथ्यात्वम् । पश्चात्तनबाधादर्शनं चासिद्धम्, शून्यमेव तत्त्वमिति वाक्येन तस्यापि बाधदर्शनात् । तत्तु भ्रांतिमूलमिति- चेत् एतदपि भ्रांतिमूलम् इति त्वयैवोक्तम् । पाश्चात्यबाधा दर्शनं तु तस्यैवेत्यलमप्रतिष्ठित कुतर्कपरिहसनेन । अद्वैत ज्ञान के पूर्व शास्त्र यदि सद्बुद्धि बोधक हैं; तो उन शास्त्रों को गगनकुसुम की तरह मिथ्या तो कह नहीं सकते ? तत्व ज्ञान के उत्पन्न हो जाने पर ही शास्त्र की असत्यता होती है । उस स्थिति में शास्त्र, चिन्मय अद्वैत ब्रह्म, विषयक ज्ञानोत्पादन में सहायक भी नहीं होते । जिस समय वे ब्रह्म प्राप्ति के साधन रहते हैं उस समय तो शास्त्र सत्य ही हैं, तब तक तो उनकी सत्ता व्याहत होती नहीं । (वादी) उक्त बात ठीक नहीं है शास्त्र को असत्य मानने से शास्त्र में जो सत्यता की बुद्धि है, वह भी मिथ्या हो जायगी (प्रतिवादी) तो उससे क्या होगा ? (वादी) फिर इस मिथ्या शास्त्र- जन्य ज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध होने से, ज्ञान का विषय ब्रह्म भी मिथ्या हो जायगा । जैसे कि कोई जलीयवाष्प को देखकर धुआँ समझ कर अग्नि का अनुमान करे, वह तो उसका मिथ्या ज्ञान ही होगा तथा उस धुआँ का विषय अनुमित अग्नि भी मिथ्या होगी । तथा परवर्त्ती किसी ज्ञान के द्वारा बाधित न होने से शास्त्र प्रतिपादित ब्रह्म सत्य है; यह कथन भी प्रमाण सिद्ध नहीं है, क्योंकि "शून्य ही एक मात्र सत्य है" यह वाक्य ही उसका बाधक है। यदि कहो कि यह वाक्य भ्रांति मूलक है, तो शास्त्र को भो तो भ्रांतिमूलक तुम्हीं ने कहा है । उक्त शून्यवादी वाक्य का परवर्ती कोई बाधक प्रमाण नहीं है । अस्तु अब अधिक, अव्यवस्थित कुतर्क रूपी परिहांस से क्या होगा ? सही मार्ग पर आना चाहिए । यदुक्तं - वेदांतवाक्यानि निर्विशेषज्ञानैकरसवस्तुमात्र प्रतिपादनपराणि "सदेव सौम्येदमग्र आसीत्" इत्येवमादीनि ।
( १०७ ) तदयुक्तम् - एक विज्ञानसर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपादनमुखेन सत् शब्दवाच्यस्य परस्य ब्रह्मणो जगदुपादानत्वं जगन्निमित्तत्वं, सर्वज्ञता, सर्वशक्तियोग, सत्यसंकल्पत्वं, सर्वान्तरत्वम्, सर्वाधारत्वं, सर्वनिय- मनम् इत्यादि अनेक कल्याणगुण विशिष्टतां कृत्स्नस्य जगतस्तदा- त्मकतां प्रतिपाद्य, एवंभूत ब्रह्मात्मकस्त्वमसीतिश्वेतकेतुं प्रत्युपंद- शाय प्रवृत्तत्वात्प्रकरणस्य । प्रपंचितश्चायमर्थो वेदार्थ संग्रहे, अत्रप्यारम्भणाधिकरणो निपुणतरमुपपादयिष्यते । “सदेव सौम्यमिदमग्र आसीत” इत्यादि वेदांत वाक्य निर्विशेष ज्ञानैकरस वस्तु के ही प्रतिपादक हैं। यह कथन भी भ्रामक है— एक के ज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाता है इस प्रतिज्ञा के आधार पर सत् पदवाच्य परब्रह्म की जगत् उपादानता, जगत् निमित्तता, सर्वज्ञता, सर्वशक्ति योग- ता, सत्य संकल्पता, सर्वान्तर्यामिता, सर्वनियामकता सर्वाधारता आदि अनेक कल्याणमय विशिष्ट गुणों और उनकी सर्व जगदात्मकता का प्रति पादन करके, ऐसा परब्रह्म "तू है" इस प्रकार श्वेतकेतु को तत्वोपदेश देने के लिए उक्त प्रकरण प्रस्तुत है। अपने वेदार्थ संग्रह में इसका विस्तृत विवेचन किया है। इस वेदांत सूत्र के आरम्भाधिकरण में भी दृढ़ता के साथ प्रतिपादन करूँगा । “अथ परा यथा तदक्षरम्” इत्यत्रापि प्राकृतान् हेयगुणान् प्रतिषिध्य नित्यत्व विभुत्व सूक्ष्मत्व सर्वगतत्वाव्ययत्वभूतयोनित्वसा- र्वज्ञादि कल्याणगुणयोग. परस्यब्रह्मणः प्रतिपादितः । “अब पराविद्या का वर्णन करेंगे जिससे अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है” इस श्रुति में प्रकृति संभूत हेयगुणों का निराकरण करके, परब्रह्म की नित्यता, व्यापकता, सूक्ष्मता,सार्वजनीनता,निर्विकारता, सर्वभूतकारणता, और सर्वज्ञता आदि कल्याण गुणों का प्रतिपादन किया गया है। “सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म” इत्यत्रापि सामानाधिकरण्यस्यानेक विशेषणविशिष्टैकार्थाभिधानव्युत्पत्त्या न निर्विशेषवस्तु सिद्धिः ankurnagpal108@gmail.com
( १०८ ) प्रवृत्ति निवृत्तिभेदनैकार्थ वृत्तित्वं सामानाधिकरण्यम् । तत्र सत्यं ज्ञानादिपदमुख्यार्थैर्गुणैस्तत्तद्गुणविरोधाकार प्रत्यनीकाकारैर्वैक- स्मिन्नेवार्थे पदानां प्रवृत्तौ निमित्तभेदोऽवश्याश्रणीयः । इयांस्तु विशेषः एकस्मिन्, पक्षे पदानां मुख्यार्थता, अपरस्मिंश्च तेषां लक्षणा । न च अज्ञानादीनां प्रत्यनीकता वस्तुस्वरूपमेव, एकेनैव पदेन स्वरूपं प्रतिपन्नमिति पदान्तरप्रयोगवैयर्थ्यात् । तथा सति सामानाधिकरण्यासिद्धेश्च, एकस्मिन् वस्तुनि वर्त्तमानानां पदानां निमित्तभेदाना श्रयणात् । न च एकस्यैवार्थस्य विशेषणभेदेन विशिष्टताभेदानेकार्थत्वं पदानां सामानाधिकरयविरोधि, एक स्यैववस्तुनो अनेकविशेषणविशिष्टता प्रतिपादन परत्वात्सामाना- धिकरण्यस्य “भिन्न प्रवृत्तिनिमित्तानां शब्दानामेकस्मिन्नर्थे वृत्तिः सामानाधिकरण्यम्” इतिहिशाब्दिकाः । “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनन्त स्वरूप है” इस श्रुति में भी ब्रह्म के साथ सत्य आदि पदों का सामानाधिकरण्य (विशेषण विशेष्यभाव का अभेद) होने से ब्रह्म की निर्विशेषता सिद्ध नहीं होती । अनेक गुण युक्त एक वस्तु का प्रतिपादन करना ही, सामानाधिकरण्य का कार्य है । विभिन्न अर्थों में प्रयोज्य शब्दों की एकार्थपरता को ही सामानाधिकरण्य कहते हैं । इसलिए सत्य ज्ञान आदि शब्दों का मुख्यार्थ, सत्यता आदि गुण रूप हो, अथवा उसके विरोधी गुण के आकारवाला हो, इन दोनों में से किसी भी एक अर्थ के ज्ञापक होने से, पदों की प्रवृत्ति, भिन्न निमित्त स्वीकारनी होगी । यही एक विशेषता होगी कि, पदों का पहिला अर्थ मुख्य तथा दूसरा अर्थ लाक्षणिक होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि सत्य आदि पदों का, अज्ञान आदिविपरीत अर्थ ही वस्तु (ब्रह्म) का स्वरूप है । क्योंकि एक ही पद से जब स्वरूप सिद्ध हो जाता है तो अन्य पदों का प्रयोग करना व्यर्थ है । उक्त बात मानने से तो सामानाधिकरण्य असिद्ध हो जायगा, क्योंकि एक वस्तु में वर्त्तमान पदों का निमित्त भेद न होगा (सामानाधिकरण्य में निमित्त भेद आवश्यक है) यदि कहो कि-विशेषण के भेदानुसार एक ही वस्तु का गुणगत भेद तो रहेगा ही; इससे तो ankurnagpal108@gmail.com
( १०६ ) विशिष्ट पदों की एकार्थता स्वीकारने वाले सामानाधिकरण्य से विरोध होगा, एक ही वस्तु के अनेक विशेषणों वाली विशिष्टता का प्रतिपादन करने वाला सामानाधिकरण्य होता है, ऐसा-वैयाकरणों का भी मत है कि “भिन्न प्रवृत्ति निमित्तक शब्दों की एक अर्थ में योजना करना सामानाधिकरण्य का कार्य है ।” यदुक्तम्- “एकमेवाद्वितीयम्” इत्यत्र अद्वितीयपदं गुणतोऽपि सद्वितीयतां न सहते, अतः सर्वशाखाप्रत्ययन्यायेन कारणवाक्यानां अद्वितीय वस्तु प्रतिपादनपरत्वमभ्युपगमनीयम् कारणतयोप- लक्षितस्याद्वितीयस्य ब्रह्मणोलक्षणमिदमुच्यते “सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म” इति । अतो लिलक्षयिषितंब्रह्म निर्गु णमेव, अन्यथा निर्गुणं निरंजनं इत्यादिभिर्विरोधश्च इति। तदनुपपन्नं-जगदुपादानस्यब्रह्मणः स्वव्यतिरिक्ताधिष्ठात्रन्तरनिवारणेन विचित्र शक्तियोग प्रतिपादन परत्वात् अद्वितीय पदस्य तथैव विचित्रशक्तियोगमेवावगमयति “तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि । जो यह कहा कि- “एकमेवाद्वितीयं” इस वाक्य में प्रयुक्त अद्वितीय पद, किसी भी गुण से ब्रह्म की द्वैतता नहीं स्वीकारता, इसलिए” सर्व- शाखा प्रत्यय न्याय” से अद्वितीय ब्रह्म के प्रतिपादन में ही समस्त वेदांत वाक्यों का तात्पर्य स्वीकारना चाहिए । कारण रूप से उल्लेख्य उस अद्वैत ब्रह्म को “सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म” कहा गया है । उक्त लक्षण वाला ब्रह्म स्वरूप से निर्गुण ही हो सकता है, सगुण नहीं, यदि सगुण स्वी- कारेंगे तो, “निर्गुण निरंजन” इत्यादि निर्गुणता बोधक श्रुति के साथ विरुद्धता होगी । यह कथन भी असंगत है-अद्वितीय पद से ज्ञात होता है कि जगत के उपादान कारण ब्रह्म में ऐसी विचित्र अद्वितीय शक्ति है कि, उसे जगत के संचालन में किसी अन्य की सहायता अपेक्षित नहीं होती । ऐसी ही विचित्र शक्ति योग की बात इस श्रुति से पुष्ट होती है-“उसने विचार किया एक से अनेक हो जाऊँ” उसने फिर तेज की सृष्टि की” इत्यादि । ankurnagpal108@gmail.com
( ११० ) अविशेषेणाद्वितीयमित्युक्ते निमित्तान्तरमात्रनिषेधः कथं ज्ञायत इति चेत्, सिसृक्षोर्ब्रह्मण उपादानकरणत्वं “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेव” इति प्रतिपादितम्। कार्योत्पत्तिस्वाभावेन बुद्धिस्थं निमित्तान्तरमिति तदेवाद्वितीयपदेन निषिध्यते इत्यवगम्यते। सर्वं निषेधे हि स्वाभ्युपगताः सिषाधयिषिता नित्यत्वादयश्च निषिद्धाः स्युः। सर्वशाखा प्रत्ययन्यायश्चात्र भवतो विपरीतफलः सर्वशाखासु कारणान्वयिनां सर्वज्ञत्वादीनां गुणानामत्रोपसंहार हेतुत्वात्। अतः कारणवाक्य स्वभावादपि “सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यनेन सविशेषमेव प्रतिपाद्यते, इति विज्ञायते यदि कहो कि—सामान्य अद्वितीय पद से, निमित्तान्तर मात्र के निषेध का अर्थ कहाँ से ज्ञात कर लिया ? सो वह तो, सृष्टि करने के इच्छुक ब्रह्म की उपादान कारणता के बोधक—“हे सौम्य ! यह जगत सृष्टि के पूर्व एक मात्र सद् ही था” इस वाक्य में प्रतिपादित तत्त्व से निश्चित हो जाता है। इस जगत् के निर्माण कार्य में ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कारण की सम्भावना का “अद्वितीय” पद से निषेध प्रतीत होता है। यदि “अद्वितीय” पद से सभी का निषेध स्वीकारेंगे तो नित्यता आदि जिन धर्मों का प्रतिपादन आवश्यक है, उनका भी निषेध हो जायगा। इस प्रसंग में, सर्वशाखाप्रत्ययन्याय की चर्चा तो आपके विपरीत प्रतिफलित होगी क्यों कि आपको वेदों की समस्त शाखाओं में वर्णित जगत कारण के प्रतिपादक सर्वज्ञता आदि गुणों का यही उपसंहार करना पड़ेगा। इसलिए, कारणता का प्रतिपादक वाक्य स्वाभाविक रूप से “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” ऐसा सविशेष का ही प्रतिपादन करता प्रतीत होता है। न च निर्गुणवाक्य विरोधः, प्राकृतहेयगुणविषयत्वात् तेषां “निर्गुणं, निरंजनं, निष्कलं, निष्क्रियं, शान्तम्” इत्यादीनाम्। ज्ञान- मात्रस्वरूपवादिन्योऽपि श्रुतयो ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूपतामभिदधति न तावता निर्विशेषज्ञानमात्रमेवतत्त्वम्, ज्ञातुरेव ज्ञान स्वरूपत्वात् ।
( १११ ) ज्ञानस्वरूपस्यैव तस्य ज्ञानाश्रयत्वं मणिद्युमणिदीपादिवत् उक्तमेव इत्युक्तम् । ऐसा मानने से, ब्रह्म की निर्गुणता मानने वाले वाक्यों से किसी प्रकार की विरुद्धता भी नही होती । “निर्गुण, संपर्क रहित अखंड, क्रिया- हीन, शान्त” आदि वाक्य, प्राकृत हेय गुणो से राहित्य के सूचक है । ज्ञानमात्र स्वरूप की प्रतिपादक श्रुतियाँ भी ब्रह्म की ज्ञानस्वरूपता को बतलाती है । वह जो ज्ञान स्वरूपता है, वह केवल निर्विशेष ज्ञान सूचक नहीं है, अपितु ज्ञाता की ही ज्ञानस्वरूपता की सूचक है। ज्ञान स्वरूप उस ब्रह्म की ज्ञान स्वरूपता, मणि, सूर्य प्रदीप आदि की तरह (प्रकाश गुण विशिष्ट) मानना ही सुसगत है, ऐसा पहले कह भी चुके है । ज्ञातृत्वमेव हि सर्वश्रुतयोवदंति- यः सर्वज्ञः सर्ववित्- तदैक्षत-' सेयंदेवतैक्षत--एईक्षतलोकान्नु सृज इति नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां एको बहूनाथो विदधाति कामान् ज्ञाज्ञौद्वावजावी- शनीशौ- तमीश्वराणां परमंमहेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् पतिपतीनां परमं परस्तात् विदामदेवं भुवनेश मीड्यम् नतस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते, परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च-एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः ।" इत्याद्याः श्रुतयः ज्ञातृत्व प्रमुखान् कल्याणगुणान् ज्ञानस्वरूपस्यैव ब्रह्मणः स्वाभाविकान्वदंति, समस्त हेय रहितांच । निर्गुणवाक्यानां सगुण वाक्याना च, विषयमपहत- पाप्मेत्याद्यपिपास इत्यन्तेन हेयगुणान् प्रतिषिध्य ' सत्यकामः सत्य संकल्प" इति ब्रह्मणः कल्याणगुणान् विधतीयं श्रुतिरेव विविनक्तीति सगुणनिर्गुणवाक्ययोर्विरोधाभावादन्यतरस्य मिथ्याविषयताश्रयण- मपि नाशंकनीयम् । ankurn
( ११२ ) ब्रह्म की ज्ञातृता तो सभी श्रुतियाँ बतलाती हैं।" जो सर्वज्ञ और सर्वविद है—उसने विचारा—उस देवता ने विचारा—उसने विचार किया कि लोकों की सृष्टि करूँ--जो नित्यों का नित्य चेतनों का चेतन है वह अकेला अनेकों की कामना पूर्ण करता है--ज्ञाता और अज्ञाता दो अजन्मा, ईश और अनीश हैं—ईश्वरों के ईश्वर देवताओं के परम देवता, पतियों के परम पति, उक्त भुवनेश्वर स्तवनीय देव की आराधना करते हैं—उसका कोई कार्य कारण नहीं हैं, न उससे कोई अधिक है, और न समान है, उसकी पराशक्ति स्वाभाविकी, ज्ञान, बल, क्रिया आदि अनेक प्रकार की सुनी जाती है--वह आत्मा निष्पाप अजर, अमर, अशोक, भूख-प्यास रहित, सत्यकाम, सत्य संकल्प है।" इत्यादि श्रुतियाँ ज्ञान स्वरूप ब्रह्म के स्वाभाविक ज्ञातृता आदि गुणों का प्रतिपादन करती है तथा उसे समस्त हेय गुणों से रहित बतलाती है। निर्गुण वाक्य और सगुण वाक्य के विषय की प्रतिपादिका “अपहतपाप्मत्ता से अपिपासः” तक हीन गुणों का प्रतिषेध करके "सत्यकामः सत्यसंकल्पः” से कल्याणमय गुणों का एक साथ विवेचन करती हुई श्रुति, सगुण निर्गुण वाक्यों के विरोध का अभाव बतलाती है। इससे अन्य श्रुतियाँ मिथ्या प्रतिपादिका है, ऐसी शंका नही करनी चाहिए। “भीषाऽस्माद्वातः पवते” इत्यादिना ब्रह्मगुणानारभ्य ‘ते ये शतम्’ इत्यनुक्रमेण क्षेत्रज्ञानन्दातिशयमुक्त्वा “यतोवाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्यमनसा सह आनन्दंब्रह्मणो विद्वान् "इति ब्रह्मणः कल्याणगुणानन्त्यमत्यादरेण वदतीयं श्रुतिः। इसी प्रकार--"इसके भय से वायु चलती है" इत्यादि से ब्रह्म के गुणों को प्रारम्भ करके "उससे शतगुण” इस क्रम से क्षेत्रज्ञ की आनन्दातिशयिता को बतलाकर "जिसे न पाकर वाणी मन सहित लौट कर आ जाती है, उस आनन्द ब्रह्म को जानकर” इत्यादि से ब्रह्म के कल्याणमय अनन्तगुणों का बड़े आदर के साथ उक्त श्रुति उल्लेख करती है [यह आनन्द बल्ली श्रुति की चर्चा है] "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणाविपश्चिता" इति ब्रह्म वेदन फलमगमयद्वाक्यं परस्य विपश्चितो ब्रह्मणो गुणानन्त्यं ब्रवीति
( ११३ ) विपश्चिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् समश्नुते । काम्यन्त इति कामाः कल्याणगुणाः । ब्रह्मणा सह तद्गुणान् सर्वाश्नुते । दहरविद्यायां “तस्मिन्यदन्तस्त्वन्वेष्टव्यम्” इतिवद् गुणप्राधान्यं वक्तुं सह शब्दः । फलोपासनयोः प्रकारैक्यम्– “यथा, क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति” इति श्रुत्यैव सिद्धम् । “ब्रह्मज्ञ पुरुष विशेषज्ञ ब्रह्म के साथ, समस्त काम्यफलों का भोग करता है” ब्रह्मज्ञानफल को बतलाने वाला यह वाक्य, परब्रह्म के अनन्त गुणों का प्रकाश करता है । ब्रह्मज्ञ, ब्रह्म के साथ सभी कामनाओं को भोगता है अर्थात् जिनकी कामना की जाय ऐसे कल्याणमय गुण ही काम्य हैं, ब्रह्म के साथ उन कल्याणमय गुणों को ही प्राप्त करता है। दहरविद्या में “उसमें जो अन्तर है, वह अन्वेषणीय है” कहे गये इस वाक्य की तरह, गुण प्राधान्य को बतलाने वाला सह शब्द है । फल और उपासना के प्रकार की एकता “इस लोक में पुरुष, जैसा प्रयास करता है, मरने पर भी वैसा ही होता है” इस श्रुति से ही सिद्ध है । “यस्यामतं तस्यमतम्, अविज्ञातं विजानताम्” इति ब्रह्मणो ज्ञाना- विषयत्वं उक्तं चेत्; “ब्रह्मविदाप्नोतिपरम्” –ब्रह्मवेद·ब्रह्मैव भवति, इति ज्ञानान् मोक्षोपदेशो न स्यात् । असन्नेव स भवति, असद् ब्रह्मेति वेदचेत् अस्ति ब्रह्मेति चेत्वेद, सन्तमेनं ततो विदुः” इति ब्रह्मविषय ज्ञानासद्भावसद्भावाभ्यामात्मनाशमात्मसत्तां च वदति । अतो ब्रह्म- विषय वेदन मेवापवर्गोपायं सर्वाः श्रुतयोविदधति । ज्ञानं चोपासना- त्मकम् । उपास्यं च ब्रह्म सगुणमित्युक्तम्। “यतोवाचो निवर्त्तन्ते, अप्राप्य मनसा सह” इति ब्रह्मणोऽनन्तस्यापरिच्छिन्न गुणस्य वाङ्मनसयो- रेतावदिति परिच्छेदायोग्यत्वश्रवणेन ब्रह्मैतावदिति ब्रह्मपरिच्छेदज्ञा- नवतां ब्रह्माविज्ञातममतम् इत्यु क्तम्, अपरिच्छिन्नत्वाद् ब्रह्मणः । अन्यथा “यस्यामतं तस्य मतम्” “विज्ञातमविजानताम्” इति मतत्वविज्ञातत्व वचनं तत्रैव विरुद्ध्यते । ankurnagpal108@gmail.com
( ११४ ) “जो यह विचार करते हैं कि-विचार से अतीत है, वेही उसे जानते हैं, विशेष रूप से जानने का दावा करने वाला कुछ भी नही जानता” इस वाक्य में ब्रह्मज्ञान की अविषयता कही गई है, यदि ऐसा मान लोगे तो “ब्रह्मवेत्ता परब्रह्म को प्राप्त करता है “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है” इत्यादि ज्ञानपरक उपदेश वाक्य व्यर्थ हो जायेंगे । “जो ब्रह्म को अस्तित्वहीन मानता है, मानों वह स्वयं ही अपने अस्ति- त्व पर शंका करता है, तथा जो उसका अस्तित्व स्वीकारता है, उसे ही वास्तविक ज्ञाता जानों” इस श्रुति में ब्रह्मविषयक ज्ञान के सद्भाव और अभाव से आत्मनाश और आत्मसत्ता की बात कही गई है । इससे स्पष्ट है कि ब्रह्मविषयक ज्ञान को ही मोक्ष के लिए सारी श्रुतियाँ स्वीकारती हैं । ज्ञान को उपासनात्मक तथा उपास्य को सगुण कहा जा चुका है । “जिसको न पाकर मन सहित वाणी लौट आती है” इस श्रुति में ब्रह्म के अपरिमित अनन्त गुणों की निस्सीमता की अकथ्यता और अमननीयता बतलाकर, गुण और परिणाम से सीमित परिच्छिन्न मानने वाले लोगों को ब्रह्म तत्व से अज्ञात बतलाया गया है । ब्रह्म तो स्वभाव से ही अपरि- च्छिन्न और अनन्त हैं । उक्त श्रुति का यदि ऐसा अर्थ नहीं मानेंगे तो, उसी जगह “यस्यामतं तस्यमतं विज्ञातमविजानताम्” इस वाक्यांश में जो मतता और विज्ञातता बतलाई गई है, वह प्रकरण विरुद्ध सिद्ध होगी । यत्तु “न दृष्टेर्दृष्टारं न मतेर्मन्तारम्” इति श्रुतिर्दृष्टेर्मते व्य- तिरिक्तं द्रष्टारं मन्तारंच प्रतिषेधति इति तदागन्तुक चैतन्यगुणयो- गितया ज्ञातुर्ज्ञान स्वरूपतां कुतर्क सिद्धां मत्वा न तथात्मानं पश्येः न मन्वीथाः, अपितु द्रष्टारं मंतारमप्यात्मानं दृष्टिमति रूपमेव पश्ये- रित्यमिदधाति इति परिहृतम् । अथवा दृष्टेर्दृष्टारं, मतेर्मन्तार जीवात्मानं प्रतिषिध्य सर्वभूतान्तरात्मानं परमात्मानमेवोपास्येति वाक्यार्थः । अन्यथा “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” इत्यादि ज्ञातृत्व श्रुतिविरोधश्च । और जो—“दृष्टि (अनुभूति) के साक्षी और मति (चिन्तन) के प्रकाशक को नहीं जानता”—इति श्रुति में अनुभूति और मननं के द्रष्टा
:
Wait, could it be:
नाऽनन्दमात्रंब्रह्म?
Let's look really closely at:
निर्देशाच्च
(space)
ना
ऽ
Wait, look above the 'ऽ' and to its right: there is a horizontal top bar!
Wait, does the 'ऽ' have a top bar?
Wait, no! The top bar starts AFTER the 'ऽ' and covers the next letter!
Wait, an avagraha NEVER has a top bar!
And indeed, the top bar is absent over the 'ऽ'!
Wait, what about the next letter?
The next letter has a top bar, and underneath is:
a vertical stem, with a loop to the left (न), and below is द! That is न्द!
Wait, but if it is just न्द, then it is ना + ऽ + न्द = नाऽन्द!
Wait, could it be नाऽऽनन्द? No.
Could it be नाऽनन्द?
Wait, why would anyone write नाऽन्द? Because the compositor thought आनन्द is अन्द? No, because they accidentally dropped the second न! The compositor was composing: ना (from न + आ), then put ऽ for the elided आ, and then instead of नन्द they set न्द! That is a classic typographical error: haplography
( ११६ ) यदिदमुक्तम्--“यत्र हि द्वैतमिव भवति”--“नेह नानाऽस्ति किंचन, मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इहनानेव पश्यति--“यत्रत्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येत्” इतिभेदनिषेधो बहुधा दृश्यत इति; तत्कृत्स्नस्यजगतो ब्रह्मकार्यतया तदन्तर्यामिकतया च सदात्मक- त्वेनैक्यात्, तत्प्रत्यनीक नानात्वं प्रतिषिध्यते । न पुनः “बहुस्यां प्रजा- येय” इति बहुभवन संकल्पपूर्वकं ब्रह्मणो नानात्वं श्रुति सिद्धं प्रति- षिध्यत इति परिहृतम् । नानात्वनिषेधादियमपरमार्थ विषयेति चेत्; न प्रत्यक्षादि सकल प्रमाणानवगतं नानात्वं दुरारोहं ब्रह्मणः प्रति- पाद्य तदेव बाध्यत इत्युपहासास्पदमिदम् । जो यह कहा कि--“जब द्वैतमत होता है”--“जगत में नानात्व कुछ भी नहीं है, विभिन्नता देखने वाला बारंबार मरता है”--“दृश्यमान सब कुछ ही जब आत्म स्वरूप है, तब किससे किसे देखोगे ?” इत्यादि भेद निषेधक वाक्य देखे जाते हैं; सो सारा जगत ब्रह्म का कार्य है, ब्रह्म उन सब में अन्तर्यामी और तदात्मक है, इसलिए वह इस भाव से उससे अभिन्न है उक्तभाव से विपरीत जो भिन्नता का भाव है उसका प्रतिषेध उक्त श्रुतियाँ करती हैं । (समाधान) “बहुत होकर जन्म लूंगा” ऐसे ब्रह्म के संकल्प की बाहुल्यता परक भिन्नता का निषेध नहीं किया गया है । इस संकल्प श्रुति से ही उक्त प्रतिषेध की बात का निराकरण हो जाता है । यदि कहो कि अन्यान्य श्रुतियों में जहाँ कहीं भी ब्रह्म के नानात्व का प्रति- षेध किया गया है वह अपरमार्थ विषयक ही है, सो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि श्रुतियाँ प्रत्यक्ष आदि सभी प्रमाणों से अज्ञात दुरूह भिन्नता वाले ब्रह्मण का प्रतिपादन करके, उसी का निषेध कर दें यह तो उपहासास्पद बात है । “यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथतस्य भयं भवति” इति ब्रह्मणिनानात्वं पश्यतो भयप्राप्तिरिति यदुक्तम्, तदसत् “सर्वं- खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत” इति तन्नानात्वानुसंधा- नस्य शांति हेतुत्वोपदेशात् । तथा हि सर्वस्य जगतदुत्पत्तिस्थिति- ankurnagpal108@gmail.com