भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १०२ ) अविद्यावत् उत्पन्न ज्ञानविषयत्वात् प्रपंचवत् “ब्रह्मज्ञानविषयत्वात् प्रपंचवत्” ! ब्रह्ममिथ्या असत्यहेतुजन्य ज्ञान विषयत्वात् प्रपंचवदेव । कथन यह है कि--जैसे, समस्त नेत्र रोग विहीन, पर्वत गुहावासी कोई व्यक्ति, गुहा के घोर अंधकार में निरन्तर रहने के कारण तिमिर रोग (रतौंधी) से ग्रस्त हो जाता है; पर अपने उस रोग को नहीं जान पाता उसके लिए वह सामान्य सी बात है; उस व्यक्ति को दो चन्द्र दिखलाई देते है, उसके लिए उस जानकारी में वहाँ कोई बाधक ज्ञान भी नहीं है (क्योंकि उसे गुहा के अतिरिक्त बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं होता) इसलिए वह अपने द्विचन्द्र ज्ञान को मिथ्या नहीं मानता; पर उसका वह ज्ञान है तो मिथ्या ही । दोष तो तभी हो, जब कि वह अयथार्थ ज्ञान हेतुक हो । इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान अविद्या मूलक होने से बाधक के न रहते हुए भी ब्रह्म ज्ञान सहित मिथ्या ही है । ऐसे प्रयोग भी किये जाते हैं—“ब्रह्म, मिथ्या ज्ञान का विषय होने के कारण, प्रपंचमय जगत की तरह मिथ्या है--“जो विवा दास्पद है वह ब्रह्म मिथ्या है”--“असत्य के हेतु शास्त्र ज्ञान का विषय होने के कारण, प्रपंचमय जगत की तरह, ब्रह्म मिथ्या है ।” (इत्यादि चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि कहते हैं) । न च वाच्यं स्वाप्नस्य हस्त्यादिविज्ञानस्यासत्यस्य परमार्थ शुभाशुभप्रतिपत्ति हेतु भाववदविद्यामूलत्वेनासत्यस्यातिशास्त्रस्य परमार्थभूतब्रह्मविषयप्रतिपत्तिहेतुभावो न विरुद्धः इति । स्वप्नज्ञान स्यासत्यत्वाभावात् । तत्र हि विषयाणामेव मिथ्यात्वम् तेषामेव हि बाधोदृश्यंते, न ज्ञानस्य, न हि मया स्वप्नवेलायामनुभूत ज्ञानमपि न विद्यत इति, कस्यचिदपि प्रत्ययो जायते । दर्शनं तु विद्यते, अर्था न संतीति हि बाधक प्रत्ययः । मायाविनो मंत्रौषधादिप्रभवं मायामयं ज्ञानं सत्यमेवप्रीतिर्भयस्य च हेतुः । तत्रापि ज्ञानस्य अबाधितत्वात् विषयेन्द्रियादि दोषजन्यं रज्ज्वादौ सर्पादिविज्ञानं सत्यमेव, भयादि हेतुः । सत्येवादष्टेऽपि स्वात्मनि सर्पसन्निधानात् दष्ट बुद्धिः सत्यैव ankurnagpal108@gmail.com