श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११६ ) यदिदमुक्तम्--“यत्र हि द्वैतमिव भवति”--“नेह नानाऽस्ति किंचन, मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इहनानेव पश्यति--“यत्रत्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येत्” इतिभेदनिषेधो बहुधा दृश्यत इति; तत्कृत्स्नस्यजगतो ब्रह्मकार्यतया तदन्तर्यामिकतया च सदात्मक- त्वेनैक्यात्, तत्प्रत्यनीक नानात्वं प्रतिषिध्यते । न पुनः “बहुस्यां प्रजा- येय” इति बहुभवन संकल्पपूर्वकं ब्रह्मणो नानात्वं श्रुति सिद्धं प्रति- षिध्यत इति परिहृतम् । नानात्वनिषेधादियमपरमार्थ विषयेति चेत्; न प्रत्यक्षादि सकल प्रमाणानवगतं नानात्वं दुरारोहं ब्रह्मणः प्रति- पाद्य तदेव बाध्यत इत्युपहासास्पदमिदम् । जो यह कहा कि--“जब द्वैतमत होता है”--“जगत में नानात्व कुछ भी नहीं है, विभिन्नता देखने वाला बारंबार मरता है”--“दृश्यमान सब कुछ ही जब आत्म स्वरूप है, तब किससे किसे देखोगे ?” इत्यादि भेद निषेधक वाक्य देखे जाते हैं; सो सारा जगत ब्रह्म का कार्य है, ब्रह्म उन सब में अन्तर्यामी और तदात्मक है, इसलिए वह इस भाव से उससे अभिन्न है उक्तभाव से विपरीत जो भिन्नता का भाव है उसका प्रतिषेध उक्त श्रुतियाँ करती हैं । (समाधान) “बहुत होकर जन्म लूंगा” ऐसे ब्रह्म के संकल्प की बाहुल्यता परक भिन्नता का निषेध नहीं किया गया है । इस संकल्प श्रुति से ही उक्त प्रतिषेध की बात का निराकरण हो जाता है । यदि कहो कि अन्यान्य श्रुतियों में जहाँ कहीं भी ब्रह्म के नानात्व का प्रति- षेध किया गया है वह अपरमार्थ विषयक ही है, सो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि श्रुतियाँ प्रत्यक्ष आदि सभी प्रमाणों से अज्ञात दुरूह भिन्नता वाले ब्रह्मण का प्रतिपादन करके, उसी का निषेध कर दें यह तो उपहासास्पद बात है । “यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथतस्य भयं भवति” इति ब्रह्मणिनानात्वं पश्यतो भयप्राप्तिरिति यदुक्तम्, तदसत् “सर्वं- खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत” इति तन्नानात्वानुसंधा- नस्य शांति हेतुत्वोपदेशात् । तथा हि सर्वस्य जगतदुत्पत्तिस्थिति- ankurnagpal108@gmail.com