भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ११७ ) लयकर्मतया यदात्मकत्वानुसंधानेनात्र शान्तिर्विधीयते । अतो यथा- वस्थित देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरादिभेदभिन्नं जगद् ब्रह्मात्मकमिति अनुसंधानस्य शांति हेतुतया अभय प्राप्ति हेतुत्वेन न भय हेतुत्व प्रसंगः । एवं तर्हि “अथ तस्य भयंभवति” इति किमुच्यते ? इदं उच्यते-“यदाह्येष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सो भयं गतो भवति” इत्यभय प्राप्ति हेतुत्वेन ब्रह्मणि या प्रतिष्ठा अभिहिता, तस्या विच्छेदेभयं भवतीति । यथो- क्तं महर्षिभिः-“यन्मुहूर्त्तंक्षणं वापिवाःसुदेवो न चिन्त्यते, साहा- निस्तन्महच्छिद्र साभ्रान्तिस्सा च विक्रिया ।” इति । ब्रह्मणि प्रतिष्ठाया अन्तरमवकाशो विच्छेद एव । “साधक जब इस ब्रह्म में थोड़ा भेद करता है, तभी उसे भय होता है” इस श्रुति में, ब्रह्म में भेद देखने वाले व्यक्ति की जो भय प्राप्ति बत- लाई गई है वह वास्तविक नहीं । है “यह सब कुछ ब्रह्म ही है, सब कुछ उसी से उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाता है । इसलिए उसकी शान्त भाव से उपासना करो” इस श्रुति में, उस ब्रह्म में जो विभिन्नता ढूंढते हैं, उसकी शान्ति के लिए उपदेश दिया गया है । तथा, समस्त जगत् की उत्पत्ति स्थिति और संहार कर्म उसी पर ब्रह्म के ही स्वरूप हैं, ऐसा अनु संधान करने से ही शान्ति मिलेगी ऐसा उक्त वाक्य का तात्पर्य है । इस- लिए देव, पशु, मनुष्य स्थावरादि भेदों वाला समस्त जगत् ब्रह्मात्मक ही है, ऐसा अनुसंधान ही शांति का कारण बतलाया गया है, उसी से अभयता प्राप्ति होती है, भय प्राप्ति का तो प्रसंग ही नहीं है । यदि ऐसी ही बात है तो “अथ तस्य भयं भवति” ऐसा क्यों कहा ? ऐसी जिज्ञासा होती है—ऐसा कहने का तात्पर्य ये है कि--“यह साधक जब अदृश्य अनि र्वाच्य, स्वप्रतिष्ठ ब्रह्म में सर्वभय निवारक निष्ठा करता है, तब वह निर्भय हो जाता है” इस श्रुति में ब्रह्म निष्ठा का, भय शांति के उपाय के रूप से जो उपदेश दिया गया है, उसके विच्छेद से भय बतलाया गया है । जैसा कि महर्षि वेदव्यास ने कहा भी है--“जिस मुहूर्त्त या क्षण में वासुदेव का चिन्तन नहीं किया जाता, वही सबसे बड़ी क्षति अनिष्ट ankurnagpal108@gmail.com