श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) प्राप्ति का मार्ग, भ्रांति और चित्त का विकार है”। वस्तुतः ब्रह्म प्रतिष्ठा से विलग होना ही विच्छेद है। यदुक्तम्-“न स्थानतोऽपि” इति सर्वविशेषरहितं ब्रह्मोति च वक्ष्यतीति; तन्न सविशेषं ब्रह्मेत्येव हि तत्र वक्ष्यति । “मायामात्रं तु” इति च स्वप्नामप्यर्थानां जागरितावस्थानुभूत पदार्थवैधर्म्येण माया- मात्रत्वमेवमुच्यत इति जागरितावस्थाऽनुभूतानामिव पारमार्थिक- त्वमेव वक्ष्यति । जो यह कहा कि—सूत्रकार “न स्थानतोऽपि” सूत्र में ब्रह्म को निर्वि- शेष ही सिद्ध करते हैं; सो बात नहीं है, वहाँ तो सविशेष ब्रह्म का ही प्रतिपादन किया गया है। तथा “मायामात्रं हि” इस सूत्र में स्वप्नदृष्ट विषयों को, जागरित अवस्थानुभूत पदार्थों से विपरीत होने के कारण मायामात्र बतलाते हैं, एवं जागरित अवस्थानुभूत विषयों की तरह होने से उनकी पारमार्थिकता बतलाते हैं। स्मृतिपुराणयोरपि निर्विशेषज्ञानमात्रमेव परम