श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०६ ) विशिष्ट पदों की एकार्थता स्वीकारने वाले सामानाधिकरण्य से विरोध होगा, एक ही वस्तु के अनेक विशेषणों वाली विशिष्टता का प्रतिपादन करने वाला सामानाधिकरण्य होता है, ऐसा-वैयाकरणों का भी मत है कि “भिन्न प्रवृत्ति निमित्तक शब्दों की एक अर्थ में योजना करना सामानाधिकरण्य का कार्य है ।” यदुक्तम्- “एकमेवाद्वितीयम्” इत्यत्र अद्वितीयपदं गुणतोऽपि सद्वितीयतां न सहते, अतः सर्वशाखाप्रत्ययन्यायेन कारणवाक्यानां अद्वितीय वस्तु प्रतिपादनपरत्वमभ्युपगमनीयम् कारणतयोप- लक्षितस्याद्वितीयस्य ब्रह्मणोलक्षणमिदमुच्यते “सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म” इति । अतो लिलक्षयिषितंब्रह्म निर्गु णमेव, अन्यथा निर्गुणं निरंजनं इत्यादिभिर्विरोधश्च इति। तदनुपपन्नं-जगदुपादानस्यब्रह्मणः स्वव्यतिरिक्ताधिष्ठात्रन्तरनिवारणेन विचित्र शक्तियोग प्रतिपादन परत्वात् अद्वितीय पदस्य तथैव विचित्रशक्तियोगमेवावगमयति “तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि । जो यह कहा कि- “एकमेवाद्वितीयं” इस वाक्य में प्रयुक्त अद्वितीय पद, किसी भी गुण से ब्रह्म की द्वैतता नहीं स्वीकारता, इसलिए” सर्व- शाखा प्रत्यय न्याय” से अद्वितीय ब्रह्म के प्रतिपादन में ही समस्त वेदांत वाक्यों का तात्पर्य स्वीकारना चाहिए । कारण रूप से उल्लेख्य उस अद्वैत ब्रह्म को “सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म” कहा गया है । उक्त लक्षण वाला ब्रह्म स्वरूप से निर्गुण ही हो सकता है, सगुण नहीं, यदि सगुण स्वी- कारेंगे तो, “निर्गुण निरंजन” इत्यादि निर्गुणता बोधक श्रुति के साथ विरुद्धता होगी । यह कथन भी असंगत है-अद्वितीय पद से ज्ञात होता है कि जगत के उपादान कारण ब्रह्म में ऐसी विचित्र अद्वितीय शक्ति है कि, उसे जगत के संचालन में किसी अन्य की सहायता अपेक्षित नहीं होती । ऐसी ही विचित्र शक्ति योग की बात इस श्रुति से पुष्ट होती है-“उसने विचार किया एक से अनेक हो जाऊँ” उसने फिर तेज की सृष्टि की” इत्यादि । ankurnagpal108@gmail.com