श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११० ) अविशेषेणाद्वितीयमित्युक्ते निमित्तान्तरमात्रनिषेधः कथं ज्ञायत इति चेत्, सिसृक्षोर्ब्रह्मण उपादानकरणत्वं “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेव” इति प्रतिपादितम्। कार्योत्पत्तिस्वाभावेन बुद्धिस्थं निमित्तान्तरमिति तदेवाद्वितीयपदेन निषिध्यते इत्यवगम्यते। सर्वं निषेधे हि स्वाभ्युपगताः सिषाधयिषिता नित्यत्वादयश्च निषिद्धाः स्युः। सर्वशाखा प्रत्ययन्यायश्चात्र भवतो विपरीतफलः सर्वशाखासु कारणान्वयिनां सर्वज्ञत्वादीनां गुणानामत्रोपसंहार हेतुत्वात्। अतः कारणवाक्य स्वभावादपि “सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यनेन सविशेषमेव प्रतिपाद्यते, इति विज्ञायते यदि कहो कि—सामान्य अद्वितीय पद से, निमित्तान्तर मात्र के निषेध का अर्थ कहाँ से ज्ञात कर लिया ? सो वह तो, सृष्टि करने के इच्छुक ब्रह्म की उपादान कारणता के बोधक—“हे सौम्य ! यह जगत सृष्टि के पूर्व एक मात्र सद् ही था” इस वाक्य में प्रतिपादित तत्त्व से निश्चित हो जाता है। इस जगत् के निर्माण कार्य में ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कारण की सम्भावना का “अद्वितीय” पद से निषेध प्रतीत होता है। यदि “अद्वितीय” पद से सभी का निषेध स्वीकारेंगे तो नित्यता आदि जिन धर्मों का प्रतिपादन आवश्यक है, उनका भी निषेध हो जायगा। इस प्रसंग में, सर्वशाखाप्रत्ययन्याय की चर्चा तो आपके विपरीत प्रतिफलित होगी क्यों कि आपको वेदों की समस्त शाखाओं में वर्णित जगत कारण के प्रतिपादक सर्वज्ञता आदि गुणों का यही उपसंहार करना पड़ेगा। इसलिए, कारणता का प्रतिपादक वाक्य स्वाभाविक रूप से “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” ऐसा सविशेष का ही प्रतिपादन करता प्रतीत होता है। न च निर्गुणवाक्य विरोधः, प्राकृतहेयगुणविषयत्वात् तेषां “निर्गुणं, निरंजनं, निष्कलं, निष्क्रियं, शान्तम्” इत्यादीनाम्। ज्ञान- मात्रस्वरूपवादिन्योऽपि श्रुतयो ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूपतामभिदधति न तावता निर्विशेषज्ञानमात्रमेवतत्त्वम्, ज्ञातुरेव ज्ञान स्वरूपत्वात् ।