श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( १०७ ) तदयुक्तम् - एक विज्ञानसर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपादनमुखेन सत् शब्दवाच्यस्य परस्य ब्रह्मणो जगदुपादानत्वं जगन्निमित्तत्वं, सर्वज्ञता, सर्वशक्तियोग, सत्यसंकल्पत्वं, सर्वान्तरत्वम्, सर्वाधारत्वं, सर्वनिय- मनम् इत्यादि अनेक कल्याणगुण विशिष्टतां कृत्स्नस्य जगतस्तदा- त्मकतां प्रतिपाद्य, एवंभूत ब्रह्मात्मकस्त्वमसीतिश्वेतकेतुं प्रत्युपंद- शाय प्रवृत्तत्वात्प्रकरणस्य । प्रपंचितश्चायमर्थो वेदार्थ संग्रहे, अत्रप्यारम्भणाधिकरणो निपुणतरमुपपादयिष्यते । “सदेव सौम्यमिदमग्र आसीत” इत्यादि वेदांत वाक्य निर्विशेष ज्ञानैकरस वस्तु के ही प्रतिपादक हैं। यह कथन भी भ्रामक है— एक के ज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाता है इस प्रतिज्ञा के आधार पर सत् पदवाच्य परब्रह्म की जगत् उपादानता, जगत् निमित्तता, सर्वज्ञता, सर्वशक्ति योग- ता, सत्य संकल्पता, सर्वान्तर्यामिता, सर्वनियामकता सर्वाधारता आदि अनेक कल्याणमय विशिष्ट गुणों और उनकी सर्व जगदात्मकता का प्रति पादन करके, ऐसा परब्रह्म "तू है" इस प्रकार श्वेतकेतु को तत्वोपदेश देने के लिए उक्त प्रकरण प्रस्तुत है। अपने वेदार्थ संग्रह में इसका विस्तृत विवेचन किया है। इस वेदांत सूत्र के आरम्भाधिकरण में भी दृढ़ता के साथ प्रतिपादन करूँगा । “अथ परा यथा तदक्षरम्” इत्यत्रापि प्राकृतान् हेयगुणान् प्रतिषिध्य नित्यत्व विभुत्व सूक्ष्मत्व सर्वगतत्वाव्ययत्वभूतयोनित्वसा- र्वज्ञादि कल्याणगुणयोग. परस्यब्रह्मणः प्रतिपादितः । “अब पराविद्या का वर्णन करेंगे जिससे अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है” इस श्रुति में प्रकृति संभूत हेयगुणों का निराकरण करके, परब्रह्म की नित्यता, व्यापकता, सूक्ष्मता,सार्वजनीनता,निर्विकारता, सर्वभूतकारणता, और सर्वज्ञता आदि कल्याण गुणों का प्रतिपादन किया गया है। “सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म” इत्यत्रापि सामानाधिकरण्यस्यानेक विशेषणविशिष्टैकार्थाभिधानव्युत्पत्त्या न निर्विशेषवस्तु सिद्धिः ankurnagpal108@gmail.com