श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११४ ) “जो यह विचार करते हैं कि-विचार से अतीत है, वेही उसे जानते हैं, विशेष रूप से जानने का दावा करने वाला कुछ भी नही जानता” इस वाक्य में ब्रह्मज्ञान की अविषयता कही गई है, यदि ऐसा मान लोगे तो “ब्रह्मवेत्ता परब्रह्म को प्राप्त करता है “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है” इत्यादि ज्ञानपरक उपदेश वाक्य व्यर्थ हो जायेंगे । “जो ब्रह्म को अस्तित्वहीन मानता है, मानों वह स्वयं ही अपने अस्ति- त्व पर शंका करता है, तथा जो उसका अस्तित्व स्वीकारता है, उसे ही वास्तविक ज्ञाता जानों” इस श्रुति में ब्रह्मविषयक ज्ञान के सद्भाव और अभाव से आत्मनाश और आत्मसत्ता की बात कही गई है । इससे स्पष्ट है कि ब्रह्मविषयक ज्ञान को ही मोक्ष के लिए सारी श्रुतियाँ स्वीकारती हैं । ज्ञान को उपासनात्मक तथा उपास्य को सगुण कहा जा चुका है । “जिसको न पाकर मन सहित वाणी लौट आती है” इस श्रुति में ब्रह्म के अपरिमित अनन्त गुणों की निस्सीमता की अकथ्यता और अमननीयता बतलाकर, गुण और परिणाम से सीमित परिच्छिन्न मानने वाले लोगों को ब्रह्म तत्व से अज्ञात बतलाया गया है । ब्रह्म तो स्वभाव से ही अपरि- च्छिन्न और अनन्त हैं । उक्त श्रुति का यदि ऐसा अर्थ नहीं मानेंगे तो, उसी जगह “यस्यामतं तस्यमतं विज्ञातमविजानताम्” इस वाक्यांश में जो मतता और विज्ञातता बतलाई गई है, वह प्रकरण विरुद्ध सिद्ध होगी । यत्तु “न दृष्टेर्दृष्टारं न मतेर्मन्तारम्” इति श्रुतिर्दृष्टेर्मते व्य- तिरिक्तं द्रष्टारं मन्तारंच प्रतिषेधति इति तदागन्तुक चैतन्यगुणयो- गितया ज्ञातुर्ज्ञान स्वरूपतां कुतर्क सिद्धां मत्वा न तथात्मानं पश्येः न मन्वीथाः, अपितु द्रष्टारं मंतारमप्यात्मानं दृष्टिमति रूपमेव पश्ये- रित्यमिदधाति इति परिहृतम् । अथवा दृष्टेर्दृष्टारं, मतेर्मन्तार जीवात्मानं प्रतिषिध्य सर्वभूतान्तरात्मानं परमात्मानमेवोपास्येति वाक्यार्थः । अन्यथा “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” इत्यादि ज्ञातृत्व श्रुतिविरोधश्च । और जो—“दृष्टि (अनुभूति) के साक्षी और मति (चिन्तन) के प्रकाशक को नहीं जानता”—इति श्रुति में अनुभूति और मननं के द्रष्टा