भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ८६ ) रश्मयो बहुलाः स्वयमेव स्फुटतरमुपलभंते, इति तद्बाहुल्यमात्रहेतु- त्वात् करतलस्य नाभिव्यंजकत्वम् । अहंकार और अनुभव के स्वाभाविक विरोध तथा व्यंग्य होने पर अनुभूति, अनुभूति न रह जायगी, इन दोनों ही बातों से सिद्ध होता है कि—दोनों में व्यंजक व्यंग्य भाव नहीं है। जैसा कि कहा भी गया है— ‘स्वाभाविक विरोध तथा वैलक्षण्य होने से दोनों में परस्पर व्यंग्य व्यंजक भाव नहीं है, यदि व्यंग्य भाव होगा तो, घट की तरह, आत्मा में अनुभूति का अभाव हो जायगा।’ सूर्य किरणें जैसे करतल को अभिव्यक्त करके, स्वयं भी उससे अभिव्यक्त होती हैं, उसी प्रकार संविद् भी अहंकार को अभिव्यक्त करके उससे अभिव्यक्त हो, ऐसा भी संभव नहीं है, क्योंकि—सूर्य रश्मियां करतल से व्यंजित नहीं होतीं, अपितु करतल में प्रतिहत वे रश्मियां, इधर उधर फैलकर अधिक स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष दीखने लगती हैं, उनकी विस्तृति के आधार पर ही, करतल को उनकी अभिव्यक्ति का कारण नहीं कहा जा सकता । किं च—अस्य संवित् स्वरूपस्यात्मनोऽहंकारनिर्वर्त्याभिव्यक्तिः कि रूपा ? न तावदुत्पत्तिः, स्वसिद्धतयाऽनन्योत्पद्यत्वाभ्युपगमात् नापि तत्प्रकाशनम्, तस्या अनुभवान्तराननुभाव्यत्वात्, ततएव च न तदनुभवसाधनानुग्रहः । स हि द्विधाज्ञेयस्येन्द्रिसंबंधहेतुत्वेनवा, यथा जाति निजमुखादिग्रहणे व्यक्ति दर्पणादीनां नयनादीन्द्रिय संबंध- हेतुत्वेन, बोद्धृगतकल्मषापनयनेन वा, यथा परतत्त्वावबोधन, साधनस्य शास्त्रस्य शमदमादिना । यथोक्तम्—“करणानामभूमि- र्त्वान्न तत्संबंध हेतुता” इति । इस संवित् स्वरूप आत्मा की अहंकार द्वारा जो अभिव्यक्ति होती है, उसका क्या रूप है.? वह अभिव्यक्ति, उत्पत्ति रूप है, ऐसा तो कह नहीं सकते, क्योंकि, स्वयंसिद्धता के आधार पर उसकी किसी अन्य के