भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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  • द्वारा उत्पत्ति नही हो सकती, ऐसा निर्णय कर चुके है । वह अभिव्यक्ति, प्रकाश रूप भी नही हो सकती, क्योकि--संवित् स्वय प्रकाश है, उसे प्रकाश मे किसी अन्य की अपेक्षा नही होती । इससे सिद्ध होता है कि-- ज्ञानानुभूति मे, अहकार द्वारा अभिव्यक्ति की सहायता अपेक्षित नही है । सहायता दो ही प्रकार से हो सकती है (१) ज्ञेय की, इन्द्रिय सबंधी कारणो से होने वाली, जैसे कि--मनुष्य आदि जाति के जानने के लिए, उस जाति के साथ चाक्षुष सबध वाले व्यक्ति द्वारा दी गई अथवा अपनी आकृति की जानकारी मे दर्पण की सहायता, (२) ज्ञाता के (हृदयगत) दोषों के अपनयन द्वारा दी जाने वाली, जैसे कि--परतत्त्व परमेश्वर को बतलाने वाले शास्त्रो से सम्मत, शम दम आदि उपायो द्वारा दी जाने वाली सहायता । जैसा कि--कहा गया है--‘‘वह अधोक्षज है (इन्द्रिय गम्य नही है) इसलिए इन्द्रियो की उससे कोई सबध हेतुता नही है ।’’ किंच-अनुभूतेरनुभाव्यत्वाभ्युपगमेऽप्यहमर्थेन न तदनुभव साध- नानुग्रहः सुवचः, स हि अनुभाव्यानुभवोत्पत्तिप्रतिबंधनिरसनेन भवेत् । यथा रूपादिग्रहणोत्पत्तिनिरोधितमसनिरसनेन चक्षुषो दीपादिना । न चेह तथाविधं निरसनीयं संभाव्यते । न तावत्सविदा- त्मगतं तज्ज्ञानोत्पत्तिनिरोधि किंचिदप्यहंकारापनेयमस्ति । अस्तिहि अज्ञानमिति चेत्, न अज्ञानस्याहंकारापनोद्यत्व अनभ्यु- पगमात् । ज्ञानमेव हि अज्ञानस्य निवर्त्तकम् । अनुभूति की अनुभाव्यता मान लेने पर भी, अहकार को, अनुभूति का सहयोगी साधक नही कहा जा सकता । ऐसा तो तभी सभव है, जब कि--अनुभाव्य के, अनुभवोत्पत्ति के अन्य प्रतिबन्धकों का, निराकरण कर दिया जाय । जैसे कि--प्रदीप आदि का आलोक, रूप आदि प्रत्यक्ष के विरोधी घने अधकार का निराकरण कर, नेत्रों का सहायक होता है । अनुभूति की अभिव्यक्ति में उस प्रकार के निवारण की संभावना ही नही है, अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा की ज्ञान प्रतिबन्धक ऐसी कोई वस्तु नहीं हैं, जिसे अहंकार दूर कर सके यदि कहो कि-अज्ञान, ज्ञान का प्रतिबंधक है; सो अज्ञान का निराकरण, अहंकार से हो नहीं सकता । ankurnagpal108@gmail.com
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