श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३२ ) छः को भग कहते हैं। व का अर्थ है अव्यय और निर्विकार, ऐसे भगवत शब्द वाले वे सर्वभूतों के आत्मा, सर्वात्मक है, उन्हीं में सारे भूत स्थित है। हीन गुणों से रहित, समस्त ज्ञान-शक्ति-वल-ऐश्वर्य-वीर्य और तेज ये छः भगवत शब्द वाच्य है। ऐसे अत्युत्तम भगवान वासुदेव से भिन्न और कोई नहीं है। पूज्यार्थ बोधन में परिभाषित यह भगवत् शब्द उसी (वासुदेव) मे मुख्यभाव से प्रयुक्त होता है, अन्य जगत गौण रूप से होता हैं। पूर्वोक्त छः शक्तियाँ जिनमें प्रतिष्ठित है, वही हरि का, जगत् विल- क्षण, अप्राकृत महत् रूप है। वे ही अपनी लीला के प्रभाव से देव, मनुष्य पशु पक्षी आदि की सृष्टि के लिए चेष्टावान होते हैं। जगत के उपकार के लिए उन अप्रमेय भगवान की जो सृष्टि लीला होती है, वह कर्म निमित्तक नहीं होती अपितु अयत्नभूत, व्यापक और अव्याहत होती है। विष्णु नामक परंपद ही निर्मल, नित्य, व्यापक अक्षर और हीनगुणों से रहित है। उत्तम ब्रह्मा आदि से अति उत्तम, स्व प्रतिष्ठ, रूप, वर्ण आदि गुणों से रहित परमात्मा, क्षय-नाश-परिणाम-वृद्धि और जन्म से रहित है। वे एकमात्र "अस्ति" शब्द से ही ज्ञेय है। सर्वव्यापक उनमें, समस्त वस्तुएं वास करती हैं, इसीलिए विद्वान उन्हें वासुदेव कहते हैं। उस परब्रह्म का स्वरूप, नित्य-अज-अक्षर-अव्यय-,सदाएक, हीन गुण रहित निर्मल है। वे स्थूल-सूक्ष्म स्वरूप, पुरुष रूप और काल में अवस्थान करते हैं। “व्यक्त और अव्यक्त रूप जिन पुरुष प्रकृति की बात कही गई, वे दोनों ही परमात्मा में लीन हो जाते हैं। उन ब्रह्म के दो रूप, मूर्त्त और अमूर्त्त, क्षर और अक्षर नामसे प्रसिद्ध, प्राणिमात्र में अवस्थित है। वह पर ब्रह्म अक्षर और सारा जगत क्षर है। एक स्थान में स्थित अग्नि की ज्वाला जैसे विस्तृत हो जाती है वैसे ही परब्रह्म की शक्ति भी समस्त जगत के रूप में विस्तृत होती है। विष्णु पराशक्ति हैं तथा क्षेत्रज्ञ अपराशक्ति है, कर्म का प्रवर्त्तन करने वाली अविद्या शक्ति तृतीय है। क्षेत्रज्ञ शक्ति स्वभाव से सर्वगामिनी होने से अविद्यामय कर्म से वेष्टित होकर निरन्तर संसार के संतापों का भोग करती है। क्षेत्रज्ञ (जीव) शक्ति, अविद्या से आवृत होकर ज्ञान के तारतम्यानुसार सब भूतों में निवास करती है। प्रधान और पुरुष दोनो ही समस्त भूतों की आत्मा के रूप से स्थित, विष्णु शक्ति-द्वारा समावृत है। विष्णु