श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२१ ) स्मृति और पुराणों में भी निर्विशेष ज्ञान मात्र को ही परमार्थ तथा अन्य को अपारमार्थिक बतलाया गया है, यह कथन भी असत् है (निम्नां- कित उदाहरणों से उक्त कथन का निराकरण हो जायेगा) “जो लोग मुझे अजन्मा और अनादि जानते हैं—समस्त प्राणी मुझमें अवस्थित हैं ,मैं उनमें अवस्थित हूँ—ऐश्वर्य योग से मुझमें स्थिति प्राणियों को देखो, जो कि मुझ भूतभावन, भूतरक्षक में विद्यमान है— मैं ही समस्त जगत की उत्पत्ति और प्रलय का कारण हूँ—मुझसे अधिक कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है—जैसे मणियाँ सूत्र में ग्रथित रहती हैं वैसे सारा जगत मुझमें ग्रथित है—मैं एकांश से सारे जगत में व्याप्त हूँ—मैं श्रेष्ठ पुरुष परमात्मा नाम से प्रसिद्ध हूँ—मैं तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर रक्षा करने वाला ईश्वर हूँ—क्षर और अक्षर से अतीत और उत्तम मैं लोक वेद में पुरुषोत्तम नाम वाला हूँ” “सर्वभूत, अव्यक्त प्रकृति, प्राकृतविकारों तथा गुण दोषों से रहित ,हर प्रकार के आवरणों से रहित, समस्त जगत के आत्मा वे ही ,भुवनगत समस्त वस्तुओं के आवरण के रूप में स्थित हैं—वे समस्त उत्कृष्ट गुणों से परिपूर्ण, अपने अंश से समस्त जगत की सृष्टि करने वाले स्वेच्छा से विराट रूप धारण करके समस्त जगत का कल्याण साधन करते हैं मानस तेज ,शारीरिक बल अणिमादि ऐश्वर्य ,समुन्नत ज्ञान ,वीर्य एवं शक्ति आदि गुणों के वे ही एक मात्र आश्रय हैं—बुद्धि मन जीव आदि से परात्पर उन परमेश्वर में क्लेश आदि कोई दोष नहीं हैं--वे व्यष्टि और समष्टि व्यक्त और अव्यक्त से अवस्थित, सर्वेश्वर, सर्वदर्शी, सर्वज्ञ ,सर्वशक्ति और परमेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं'—जिनके आश्रय से लोक ज्ञान पाता है, वह् स्वभावतः निर्दोष, विशुद्ध, महत्, निर्मल और एक रूप हैं—वे दीखते हैं या प्रतीतिगम्य हैं (भक्त को दीखते हैं, ज्ञानी को उनकी प्रतीति होती है) ऐसा ज्ञान ही यथार्थ, बाकी सब कुछ अज्ञान है । “सब कारणों के कारण, शुद्ध महाविभूति परब्रह्म के लिए भगवान शब्द का प्रयोग किया जाता है; इसमें भ के दो अर्थ हैं, संभर्त्ता (शासक) और भर्त्ता (धारक) ग के अर्थ है, नेता और प्रापक । संम्पूर्ण ऐश्वर्य (अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता, वशिता और कामावसायिता) वीर्य (शक्ति)यश श्री (भाग्यसंपत ज्ञान, और वैराग्य इन ankurnagpal108@gmail.com