भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १२६ ) हो सकते, क्योंकि—उनकी बोध शक्ति स्वतः सिद्ध नहीं होती, अन्य से लब्ध होती है। इसलिए स्वभावसिद्ध ज्ञानसंपन्न निर्मल ब्रह्म ही एक मात्र ध्येय है।” इत्यादि परब्रह्म विष्णु के स्वरूप को अपने से श्रेष्ठ ध्येय शुभाश्रय बतलाया गया है। इस वाक्य का प्रतिपाद्य भेद अप लाप (बकवास) नहीं प्रतीत होता। “ज्ञानस्वरूपम्” इत्यत्रापि ज्ञानव्यतिरिक्तस्यार्थजातस्य कृत्स्नस्य न मिथ्यात्वं प्रतिपाद्यते, ज्ञानस्वरूपस्यात्मनो देवमनुष्यादि अर्था- कारेणावभासो भ्रांतिरित्येतावन्मात्र वचनात्। नहि शुक्तिकाया रजततयाऽवभासो भ्रांतिरित्युक्ते जगति कृत्स्नं रजतजातम् मिथ्या भवति। जगद्ब्रह्मणोः सामानाधिकरण्येनैक्य प्रतीते., ब्रह्मणो. ज्ञान स्वरूपस्यार्थकारता भ्रांतिरित्युक्ते सति अर्थजातस्य कृत्स्नस्य मिथ्या त्वमुक्तं स्यादिति चेत्; तदसत् अस्मिन् शास्त्रे परम्यब्रह्मणोः विष्णो निरस्ताज्ञानादिनिखिलदोषगंधस्य समस्तकल्याणगुणात्मकस्य महा विभूतेः प्रतिपन्नतया तस्य भ्रांतिदर्शनासम्भवात्। सामानाधिकर- ण्येनैक्य प्रतिपादनं च बाधासहम्, अविरुद्धं चेत्यनन्तरमेवोपपादा यिष्यते। अतोऽयमपि श्लोको नार्थस्वरूपस्य बाधकः। “ज्ञानस्वरूपं” इस वाक्य में भी, ज्ञान से भिन्न सभी पदार्थों के मिथ्यात्व का प्रतिपादन नहीं किया गया है। ज्ञानमय आत्मा देव,मनुष्य आदि आकारो से अवभासित मात्र ही, है ऐसा समझना भ्रांति है। और न शुक्ति में होने वाली रजत भ्रांति के कारण जगत की सारी रजत राशि ही मिथ्या है। “रजत और ब्रह्म की सामानाधिकरण्य (विशेषण विशेष्य) भाव परक ऐक्य प्रतीति होने से ब्रह्म के ज्ञानस्वरूप की जडजगदाकारता रूप प्रतीति भी भ्रांति ही है, इसीलिए सारे ही जागतिक पदार्थों का मिथ्यात्व है।” तुम्हारा यह कथन भी मिथ्या है, क्योंकि—इस वेदान्त शास्त्र में अज्ञान आदि समस्त दोषों से रहित, कल्याणमय गुणोंवाले पर ब्रह्म विष्णु की महाभूति से प्रतिपन्न सारे जगत को बतलाया गया है, इसलिए उसमें मिथ्यात्व देखना सम्भव नहीं है (अर्थात् यह जगत महामा- ankurnagpal108@gmail.com