श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२७ ) (हम विष्णु की शक्ति का विलासमात्र है ऐसे जगत को मिथ्या कैसे कह सकते हो ? ) सामानाधिकरण्य परक ऐक्य प्रतीति की बात भी असंगत है, यदि तुम कहो कि, नहीं अविरुद्ध है; तो हम इसका अभी सयुक्तिक उत्तर देंगे । पर "ज्ञानस्वरूपं" आदि श्लोक प्रभु के जागतिक रूप का बाधक नहीं सिद्ध होता । तथाहि—"यतो वा इमानि भूतानि जायंते, येन जातानि जीवंति यत्प्रयंत्यभिसंविशंति, तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म" इति जगज्जन्मादिकारणं ब्रह्म'त्यवसिते सति; "इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् विभेत्यल्पश्रु तात् वेदो मामयं प्रतरिष्यति” इति शास्त्रे- ऽस्यार्थस्य इतिहास पुराणाभ्यामुपबृंहणं कार्यमिति विज्ञायते । उपबृंहण नाम विदितसकलवेदतदर्थानां स्वयोगमहिमसाक्षात्कृतवेदतत्वा- र्थानांवाक्यैः स्वावगतभेदवाक्यार्थ व्यक्तीकरणम् । सकल शाखागत- स्य वाक्यार्थस्याल्पभागश्रवणात् दुखगमत्वेन तेन विना निश्चयायो- गादुपबृंहणं हि कार्यमेव । तथा—"जिससे ये सारे भूत उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित रहते हैं, तथा मृत्यु के समय जिसमें प्रविष्ट होते हैं, उन्हीं को जानो, वही ब्रह्म है" इस श्रुति से जगत के जन्मादि के कारण, परब्रह्म हैं, ऐसा निश्चित हो जाने पर—"इतिहास और पुराणों से वेद का उपबृंहण करना चाहिए अल्पज्ञपुरुष मेरे तत्व को छत विक्षत कर देगा, इससे वेद सदा भयभीत रहता है" इस वाक्य से ज्ञात होता है कि—वेद के अर्थ का इतिहास और पुराण से उपवृंहण करना चाहिए । वेद और वेदार्थ से अवगत, योग महिमा से, वेद तत्व को साक्षात्कार करने वाले महापुरुषों के वाक्यों से अपने ज्ञात वेदार्थ को सुस्पष्ट कर लेना ही उपवृंहण है । वेद के एकांश मात्र के अध्ययन से, अनेकानेक वेद शाखाओं से संबद्ध वेद वाक्यों का अर्थ निर्णय करना संभव नहीं है, इसलिए उक्त प्रकार का वेदोपवृंहण आवश्यक है । तत्र पुलस्त्य वशिष्ठ वरप्रदानलब्ध परदेवतापारमार्थ्य ज्ञानवतो भगवतः पराशरात् स्वावगत वेदार्थोपबृंहणमिच्छुन्मैत्रेयः ankurnagpal108@gmail.com