भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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संगच्छन्ते । तथाहि सति प्रपंचभ्रमस्य किमधिष्ठानमित्येवं रूपस्ये- कस्यप्रश्नस्य निर्विशेषज्ञानमात्रमित्येवंरूपमेकमेवोत्तरं स्यात् । जगद्ब्रह्मणोरेकद्रव्यत्वपरे च सामानाधिकरण्ये सत्यसंकल्पत्वादि कल्याणगुणैकतानता निखिलहेयप्रत्यनीकता च बाध्यते । सर्वाशु- भास्पदं च ब्रह्म भवेत् । यहाँ ब्रह्म का विशिष्ट स्वरूप, उनकी विभूति प्रकार भेद, तथा उनके आराधन स्वरूप, और उसके फल-विशेष को पूछा गया है । ब्रह्म के स्वरूप विषयक प्रश्न में "जिससे यह चराचर उत्पन्न होता है" ऐसी निमित्त और उपादान कारण विषयक जिज्ञासा की गई है, तथा "तन्मयः" पद से सृष्टि, स्थिति और लय के कर्मभूत इस जगत् के स्वरूप की जिज्ञासा की गई है । 'जगच्च सः' पद से उक्त जगत् संबंधी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जगत् की जो ब्रह्म से तादात्म्य उक्ति है, वह अन्तर्यामी रूप से आत्मा में ब्रह्म की व्याप्ति-परक है । व्याप्य व्यापक वस्तु की एकता- परक नहीं है । "यन्मयं" प्रश्न का उत्तर "जगच्च सः" सामानाधिकरण्य (विशेषण विशेष्य) भाव संबंधी है । "यन्मयं" पद में प्रयुक्त मयट् प्रत्यय विकारात्मक नहीं है । यदि ऐसा होता तो पृथक प्रश्न करना ही व्यर्थ होता । और न "प्राणमय" आदि की तरह, मयट् स्वार्थिक ही है । स्वा- र्थिक होता तो "जगच्च सः" उत्तर व्यर्थ हो जाता । स्वार्थिक मयट् में तो "यह जगत् विष्णु ही है" ऐसा उत्तर होता । इसलिए "तत्प्रकृतवचने- मयट्" सूत्र के अनुसार प्राचुर्यार्थक मयट् ही समीचीन प्रतीत होता है । सारा जगत् उसका शरीर है, इसलिए प्राचुर्य अर्थ ही संगत है । इस प्रकार "यन्मयं" इस प्रश्न का उत्तर "जगच्च सः" सामानाधिकरण्य- परक है जो कि जगत् और ब्रह्म के शरीरात्मभाव का द्योतक है, ऐसा निश्चित होता है । ऐसा अर्थ न मानकर, शास्त्र को निर्विशेष वस्तु-प्रति- पादन-परक मानेंगे तो, उक्त सारे ही प्रश्नोत्तर असंगत हो जायेंगे तथा उक्त विवरण प्रस्तुत करने वाला सारा शास्त्र असंगत हो जायगा । ऐसा मानने से यह प्रश्न भी उठ खड़ा होगा कि इस जगत् को जिसे भ्रांत- परिकल्पित मिथ्या कहते हो, उसका अधिष्ठान कौन है ? यदि उसके उत्तर में कहों कि निर्विशेष ज्ञान की वस्तु ही अधिष्ठान है, तो फिर सामाना-