भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १३० ) धिकरण्य द्वारा जगत् और ब्रह्म की एकद्रव्यता, सत्य संकल्प आदि गुणैकतानता, समस्त हेयप्रत्यनीकता आदि का बाध हो जायगा, तथा ब्रह्म, समस्त अशुभों का आस्पद हो जायगा । आत्मशरीरभाव एवेदं सामानाधिकरण्यं मुख्यवृत्तमिति स्थाप्यते, अतो—"विष्णोःसकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम्, स्थितिसंयमकत्र्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्चसः ।" इति संग्रहेणोक्तमर्थम् "परः पराणाम्" इत्यारम्यविस्तरेणवक्तुं परब्रह्मभूतं भगवन्तं विष्णुं स्वेनैव स्वरूपेणावस्थितम् "अवकाराय" इति श्लोकेन प्रथमं प्रणम्य तमेव हिरण्यगर्भस्वावतारशंकररूपत्रिमूर्तिप्रधानकाल- क्षेत्रज्ञसमष्टिव्यष्टिरूपेणावस्थितं च नमस्करोति । तत्र "ज्ञानस्वरूपं" इत्ययं श्लोकः क्षेत्रज्ञव्यष्ट्यात्मनाऽवस्थितस्य परमात्मनः स्वभावमाह । तस्मान्नात्र निर्विशेष वस्तु प्रतीतिः । इस जगत् का और परमात्मा का आत्मशरीरभाव है, ऐसा ही, सामानाधिकरण्य से मुख्य तात्पर्य निकलता है, जैसा कि—"यह जगत् विष्णु से ही उत्पन्न होता है, वे ही स्थिति और संयम के कर्त्ता हैं, इस- लिए वे ही जगत् स्वरूप हैं।" इस श्लोक में संक्षेपरूप से जो अर्थ है, उसे ही "परंपराणाम्" आदिश्लोक में विस्तृत रूप से कहने के अभिप्राय से, स्वरूपावस्थित परब्रह्मस्वरूप भगवान को "अधिकाराय" इत्यादि श्लोक में प्रणाम करके पुनः हिरण्यगर्भ शंकर, विष्णु, आदि त्रिमूर्तियों, प्रधान (प्रकृति) काल, क्षेत्रज्ञ (जीव) आदि समष्टि-रूप से अवस्थित उन्हीं को प्रणाम करते हैं। फिर "ज्ञानस्वरूपम्" इस श्लोक में व्यष्टि जीवात्मा के रूप से अवस्थित परमात्मा के स्वभाव का निरूपण किया गया है। इससे यहाँ निर्विशेष वस्तु की प्रतीति नही होती। यदि निर्विशेष ज्ञानस्वरूपब्रह्माधिष्ठानभ्रमप्रतिपादनपरं शास्त्रं, तर्हि—"निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः, कथंसर्गा- दिकर्त्तृत्वं ब्रह्मणोऽप्युपगम्यते "इति चोद्यम" शक्तयः सर्वभावाना ankurnagpal108@gmail.com