भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 213

( १५३ ) ज्ञानस्य व्यावत्त॑कत्वेनावभासो युज्यते । तस्मात् न्यायोपवृंहितेन प्रत्यक्षेण भावरूपमेवाज्ञानं प्रतीयते । तदिदं भावरूपमज्ञानं अनु- मानेनापि सिध्यति । विवादाध्यसितं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभाव- व्यतिरिक्त स्वविषयावरण स्वनिवर्त्त्य स्वदेशगतस्तु अन्तरपूर्वकम्, अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वात्, अन्धकारे प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा- वत् इति । वस्तु के यथार्थ स्वभाव को प्रकाशित करने वाले साक्षी चैतन्य (अनुभविता जीवात्मा) से, भावरूप अज्ञान की विरुद्धता हो गयी ? ऐसा संशय नहीं करना चाहिए, वस्तु का यथार्थ स्वभाव प्रकाशन साक्षी चैत- न्य का विषय नहीं है, अपितु उसका विषय तो अज्ञान प्रकाशन है' अन्यथा वह मिथ्यार्थावभास न कर सकता । अज्ञान (असत्यवस्तु) विषयक अवभास से अज्ञान का निवारण तो हो नहीं सकता, इसलिए चैतन्य के साथ अज्ञान का विरोध भी नहीं है । “मै अज्ञ हूँ” इस प्रतीति में “अहं” पदार्थ आत्मा के साथ अज्ञान की भी प्रतीति होती है । स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश आत्मा जब किसी भी प्रमाण के अधीन नहीं है, ऐसा साक्षी चैतन्य आत्मा “अहं” पदार्थ को छोड़कर केवल अज्ञान को ही अपना विषय कैसे करता है ? ऐसी आपत्ति भी नही की जा सकती क्योंकि—सभी ज्ञात अज्ञात वस्तुएं साक्षी चैतन्य की प्रतीति की विषय हैं । जडरूप से ज्ञात होने वाली वस्तुओं में प्रमाण अपेक्षित होते हैं । अजड वस्तुएं स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश होने से, प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रखतीं, वो सब तो अज्ञान से भिन्न हैं इसलिए सदा अवभासित हो सकती हैं । इस प्रकार युक्ति सिद्ध प्रत्यक्ष प्रमाण से अज्ञान की भावरूप प्रतीति सिद्ध होती है । अज्ञान पदार्थ भावरूप है, अभावरूप नहीं, यह बात अनुमान से भी प्रमाणित है । प्रमाण समुत्पादित ज्ञान द्वारा अज्ञात विषय प्रकाशित हुआ करता है, ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व, उसके प्रागभाव से भिन्न उसके प्रकाश विषय को आवरक वस्तु स्वयं उसके द्वारा ही निवार्य होती है (अर्थात्— ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व किसी एक ऐसी वस्तु की स्थिति माननी पड़ेगी जो