भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214

( १५४ ) उस ज्ञानको आवृत किये रहती हैं। जिसे कि ज्ञान निवारण कर सके, आत्मा से समुत्पन्न यह ज्ञान आत्मा के आश्रित तो रहता ही है, इसलिए आवृत करने वाली वस्तु को ज्ञान का प्रागभाव नहीं कह सकते, अर्थात् ज्ञान की स्थिति नित्य है, उसका प्रागभाव होता नहीं, इसलिए उत्पत्ति के पूर्व वह किसी वस्तु से आवृत रहता है, अभावरूप नहीं रहता) उत्पत्ति के पूर्व वह ज्ञान, अन्धकार में प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा की तरह सदा आत्मा के आश्रित विद्यमान रहता है। आलोकाभावमात्रं वा रूपं दर्शनाभावमात्रं वा तमो न द्रव्यान्तरम्, तत्कथं भावरूपाज्ञान साधने निदर्शनतयोपन्यस्यते ? इति चेत् उच्यते-बहुलत्वविरलत्वाद्यवस्थायोगेन रूपवत्तया चोपलब्धेर्द्रव्यान्तरमेव तम इति निरवद्यम्, इति । (संशय) यदि कहो कि—आलोक का अभाव या रूप के दर्शन का अभाव ही तो अन्धकार है, अन्धकार कोई वस्तु नहीं है इसलिए उसे भाव- रूप अज्ञान की सिद्धि के लिए दृष्टान्तरूप से उपस्थित कर रहे है ? (समाधान) हल्के और घने तथा काले रूप से उस अन्धकार की उपलब्धि होती है, इसलिए अन्धकार नाम की कोई वस्तु अवश्य है। अत्रोच्यते-“अहमज्ञो मामन्यंच न जानामि” इत्यत्रोपपत्ति- सहितेन केवलेन च प्रत्यक्षेण न भावरूपमज्ञानं प्रतीयते । वस्तु- ज्ञान प्रागभावविषयत्वे विरोध उक्त., सहि भावरूपाज्ञानेऽपि तुल्यः । विषयत्वेनाश्रयत्वेन चाज्ञानस्य व्यावर्त्तंकया प्रत्यगर्थः प्रतिपन्नो वा अप्रतिपन्नो वा ? प्रतिपन्नश्चेत् तस्वरूपज्ञान निवर्त्यं तद ज्ञानं तस्मिन् प्रतिपन्ने कथमिव तिष्ठति । अप्रतिपन्नश्चेत—व्यावर्त्त- काश्रय विषय ज्ञान शून्यमज्ञानं कथमनुभूयेत ? (पूर्वपक्ष के उक्त तर्क का समाधान)— “मैं अज्ञ अपने को तथा अन्यों को नही जानता” ऐसी जो अज्ञान की प्रतीति होती है, युक्ति या प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा उसे भाव रूप से