श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( १७२ ) शयानस्य स्वप्नसद्दशः स्वदेहेनैव देशान्तरगमनराज्याभिषेकशिरश्छे- दादयश्च पुण्यपापफलभूताश्शयान देहसरूपसंस्थान देहान्तर सृष्ट्योपपद्यन्ते । "मनुष्य के सोने पर वह जागता हुआ, पर्याप्त रूप से काम्यपदार्थों का निर्माण करता है, वही शुक्र, वही ब्रह्म, वही अमृत है, साराजगत उसी के आश्रित है, कोई भी उसे अतिक्रमण नहीं कर सकता ।" इत्यादि भी उक्तमत की ही पुष्टि करते हैं । सूत्रकार भी "संध्ये सृष्टिराहहि" निर्मातारंपुत्रादयश्चैके" इत्यादि दो सूत्रों से स्वप्न पदार्थों की सृष्टि में जीव विषयक आशंका करके— "मायामात्र" इत्यादि सूत्र से जीव की संकल्प रहित सृष्टि क्रिया का निराकरण करते है। संसार दशा में जीव की सत्य संकल्पता आदि विशेषताये जब अव्यक्त रहती है, तब स्वप्न सृष्टि कैसे संभव है यह आश्चर्यमयी सृष्टि तो सत्य सकल्प ईश्वर की ही कृति है "सारे लोक इसी के आश्रित रहते है, इसका अतिक्रमण नहीं कर सकते इस वाक्य से स्वप्न सृष्टि परमात्मा की ही निश्चित होती है। इस दृष्टान्त से सूत्रकार जीव संबंधी आशका का समाधान करते हैं घर में सोया हुआ व्यक्ति, देशांतरगमन, राज्याभिषेक, शिरच्छेदन आदि विचित्रताओं की प्रतीति करता है। पाप पुण्य के फल भोग के लिए, तात्कालिक एक विशेष निर्मित देह से सारी क्रियायें होती हैं । पीतशंखादौ तु नयनवर्तिपित्तद्रव्यसंभिन्ना नायनरश्मयः शंखादि भिः संयुज्यन्ते । तत्र पित्तगत पीतिमाभिभूतः शंखगत शुक्लिमा न गृह्यते । अतः सुवर्णानुलिप्तशंखवत् पीतः शंख इति प्रतीयते । पित्त द्रव्यं तद्गत पीतिमा चातिसौक्ष्म्यात् पार्श्वस्थैः न गृह्यते । पित्तो- पहतेन तु स्वनयन निष्क्रान्ततयाऽतिसमीप्यात् सूक्ष्मपि गृह्यते । तद् ग्रहण जनितसंस्कार सचिव नायनरश्मिभिः दूरस्थमपि गृह्यते । पीतशंख की जो प्रतीति होती है, उसमें नयनगत पित्त से नयन रश्मि याँ मिश्रित हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप श्वेतशंख पीला दीखता है, वहाँ पित्तजन्य पीतिमा से अभिभूत शखगत शुक्लिमा की प्रतीति नहीं हो पाती। इसलिए सुवर्ण रंजित शंख सा वह शंख पीला दीखता है। ankurnagpal108@gmail.com