श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७३ ) अतिसूक्ष्म नयनगत पित्तजन्य पीतिमा निकटस्थ व्यक्ति को भी नहीं दीखती, परंतु पित्ताक्रान्त व्यक्ति को वह अति निकट से परिलक्षित हो जाती है, क्योंकि उसके नेत्रों से ही वह सदा निकलती रहती है । इसी प्रकार दूरस्थ शंख भी नयन की पीत रश्मियों के द्वारा पीला अवभासित होता है । जपाकुसुम समीपवर्तिस्फटिकमणिरपितत्प्रभाभिभूततया रक्त इति गृह्यते । जपाकुसुमप्रभाविततापिस्वच्छद्रव्य संयुक्ततया स्फुटत- रमुपलभ्यते, इत्युपलब्धिव्यवस्थाप्यमिदम् । मरीचिका जलज्ञानेऽपि तेजः पृथिव्योरप्यम्बुनोविद्यमानत्वात् इन्द्रियदोषेण तेजः पृथिव्योरग्रहणादृष्टवशाच्चाम्बुनोग्रहणा- द्यथार्थत्वम् । अलातचक्रेऽप्यलातस्यद्रुततरगमनेन सर्वदेशसंयोगादंतराला ग्रहणात्तथा प्रतीतिरूपपद्यते । चक्रप्रतीतावप्यन्तरालाग्रहणपूर्वकतत्त- द्देशसंयुक्ततद्वस्तु ग्रहणमेव । क्वचिदंतरालाभावात् अन्तराला- ग्रहणम् क्वचिच्छैघ्यादग्रहणमिति विशेषः । अतस्तदपि यथार्थम् । दर्पणादिषु निजमुखादि प्रतीतिरपि यथार्था । दर्पणादि प्रति- हतगतयो हि नायनरश्मयो दर्पणादिदेशग्रहणपूर्वकं निजमुखादिगृह्णं- ति तत्रापि अतिशैघ्यादन्तरालाग्रहणात्तथा प्रतीतिः । जपाकुसुम की निकस्थ स्फटिकमणि, उसकी कांति से अभिभूत होकर रक्तवर्ण की दिखलाई देती है । जपाकुसुम की प्रभा चारों ओर फैलती हुई, स्वच्छ द्रव्य से मिश्रित होकर स्पष्ट रूप से देखी जाती है, इसकी प्रतीति का यही स्वरूप है, जो कि यथार्थ है । मरीचिका में जो जल की प्रतीति होती है, वह भी तेज और पृथ्वी में जो जलीय अंश है उसी का भान होने से होती है, इन्द्रियगत दोष के कारण उस समय पृथिवी और तेजीय अंशों की प्रतोति नहीं हो पाती इसलिए यह ज्ञान भी यथार्थ है । ankurnagpal108@gmail.com