भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 235

( १७५ ) तु दोषे स्वदेशविशिष्टस्य चन्द्रस्यैकग्रहण वेद्यत्वादेकश्चन्द्रः इति भवति प्रत्ययः। दोषकृतं तु सामग्री द्वित्वं तत्कृतं ग्रहणद्वित्वं; तत्कृतं ग्राह्याकार द्वित्वं चेति निरवद्यम् । दिग्भ्रम में भी, भ्रांत दिशा का, अन्यान्य दिशाओं से संबंध होने के कारण, केवल मात्र एक ही दिशा का जो ज्ञान होता है, वह भी यथार्थ ही है, क्योंकि ठीक से न देख पाने के कारण गन्तव्य दिशा की ओर न जाकर दूमरी दिशा की ओर भटकना हो जाता है । आँख पर अंगुली रखने से चाक्षुष रश्मियाँ दो भागों में विभक्त हो जाती हैं, जिससे दो चन्द्रो का भान होता है, रश्मियों का एक भाग तो ठीक चन्द्रमा के सामने पड़ता है, दूसरा भाग तिरछा होकर कुछ दूर दूसरे चन्द्र को देखता है, इस प्रकार दो चन्द्रों की प्रतीति होती है। नेत्र रश्मियाँ हैं तो सत्य ही, इसलिए उनके द्वारा स्वतंत्र रूप से जो दो चन्द्र देखे जाते हैं, वह प्रतीति भी यथार्थ ही है प्रत्यभिज्ञा में केवल नेत्र ही ज्ञान के साधन नहीं होते, अपितु पूर्व संस्कार भी अपेक्षित होता है । दो चन्द्रों की भिन्न प्रतीति करते हुए भी, जो एक चन्द्र का निश्चित ज्ञान बना रहता है, वह पूर्वसंस्कारजन्य ही रहता है । दोनों नेत्र एक ही कार्य करते है, फिर भी चाक्षुष तेज में तिमिरादि (रोगविशेष) के दोष से 'त्रों के कार्य में विभिन्नता आ जाने के कारण भी दो चन्द्रों की प्रतीति होती है, दोष के ज्ञान हो जाने पर सही अवगति होती है, तब दो के बजाय एक ही चन्द्र प्रतीत होने लगता है । दोष के कारण ही, साधन मैं द्वैत होता है, साधन द्वैत से ज्ञान में द्वैत होता है और उनके अनुसार चन्द्र दो प्रतीत होते हैं । इनसे ज्ञात होता है, कि उक्त द्वैत प्रतीति यथार्थ है । अतः सर्वविज्ञानजातं यथार्थमिति सिद्धम्। ख्यात्यंतराणां दूषणानि तैस्तैर्वादिभिरेव प्रपंचितानीति न तत्र यत्नः क्रियते । अथवा किमनेन बहुनोपपादनप्रकारेण । प्रत्यक्षानुमानागमाख्यं प्रमाणजातमागम्यं च निरस्तनिखिलदोषगंधमनवधिकातिशयसंख्ये- यकल्याणगुणगणं सर्वज्ञं सत्यसंकल्पं परंब्रह्माभ्युपगच्छतां किं न सेत्स्यति । किं नोपपद्यते । भगवताहि परेणब्रह्मणा क्षेत्रज्ञपुण्य- ankurnagpal108@gmail.com