भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १७६ ) प.पानुगु तद् ग्यतयायाखिल जा त् सृजता सुखदु.खोपेक्षाफलानु- भवानुभाव्याः पदार्थाः सर्वसाधारणानु..व विषयाः, केचन तत्पुरुष- मात्रानुभवविषयाः तत्तत्कालावसानाः तथातथाऽनुभाव्याः सृज्यन्ते । तत्र बाध्यबाधकभावः सर्वानुभवविषयतया तद्रहिततया चोपपद्- यत इति सर्वं समंजसम् । उक्त दृष्टान्तों से सिद्ध हो चुका कि प्रतीयमान समस्त जगत यथार्थ है। ख्यातियों में जो दोष है, वे स्वयं ख्यातिवादियों द्वारा परस्पर निरा- कृत हो चुके है, उसके लिए हमने प्रयास नही किया। बहुत अधिक समर्थन की चेष्टा से कोई विशेष लाभ भी नही है। जो लोग, प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम (शास्त्र) प्रमाण मानते है तथा समस्त दोषों से रहित—, न्यूनाधिक भावरहित—असंख्य-कल्याणमयगुण विभूषित—सत्य- संकल्प—सर्वज्ञ-आदि गुण विशिष्ट परब्रह्म का अस्तित्व भी स्वीकारते हैं, उनकी दृष्टि में तो कुछ भी परिहार्य और असंगत नहीं है। परब्रह्म भगवान्—जीव के पाप पुण्य के अनुसार, सुख दुःखों से अपेक्षित फलवाले जिन जीवोपभोग्य पदार्थों का सर्जन करते हैं; उनमें कुछ सर्वसाधारण के अनुभव के योग्य, कुछ व्यक्ति विशेष के अनुभव के योग्य, एवं कुछ विशेष समय में अनुभव योग्य होते हैं। वे सृष्ट पदार्थ परस्पर बाध्य बाधक भाव से सर्वानुभूतविषयक और व्यक्ति विशेष के अनुभव विषयक होने से उपपन्न और सुसंगत होते हैं। यत् पुनः सदसदनिर्वचनीयमज्ञानं श्रुतिसिद्धमिति, तदसत् । “अनृतेन हि प्रत्यूढाः” इत्यादिश्वनृतशब्दस्यानिवर्चनीयानभिधा- यित्वात् । ऋतेतरविषयो हि अनृत शब्दः । ऋतमिति कर्म वाचि । “ऋतं पिबन्तौ ” इति वचनात् । ऋतं कर्मफलाभिसंधिरहितं, परं पुरुषााराधानवेषं तत्प्राप्तिफलम् । अत्र तद्व्यतिरिक्तं संसारिकफलं कर्मानृतं ब्रह्म प्राप्ति विरोधि” एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति अनृतेन हि प्रत्यूढाः” इति वचनात् । और जो—सदसद् अनिर्वचनीय अज्ञान को श्रुति संम्मत बतलाया, वह भी असंगत बात है। “अनृतेन हि प्रत्यूढा.” वाक्य में प्रयुक्त “अनृत”