श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शयति । परं पुरुषस्य च तद्वत्तामात्रेण मायित्वमुच्यते, नाज्ञत्वेन जीवस्यैव हि मायया निरोधः श्रूयते । “तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः ” इति, “अनादिमायया सुप्तोयदा जीवः प्रबुध्यते” इति च । “इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते” इत्यत्रापि विचित्राः शक्तयोऽभिधीयन्ते । अत एवहि “भूरित्वष्टेव राजति” इत्युच्यते, नाऽसि “मिथ्याभिभूतः कश्चिद्विराजते ” । “ मम माया दुरत्यया” इत्यत्रापि गुणमयीति वचनात् सैव त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः उच्यते इति । न श्रुतिभिः सदसदनिर्वचनीय अज्ञान प्रतिपादनम् । “सृष्टि से पूर्व सद् भी नही था, असद् भी नही था” इस वाक्य में सद् असद् शब्द, चेतन-जड व्यष्टि बोधक है। उत्पत्ति के समय “सत्” और ‘त्यत्’ शब्द से व्यष्टि रूप, जडचेतन वस्तु का निरूपण, किया गया है, वह प्रलय के समय “अचित् रूप समष्टि ‘तम” शब्द वाक्य प्रकृति में लीन हो जाती हैं, यही उक्त वाक्य का तात्पर्य है। इस वाक्य में सद्सद् अनिर्वचनीयता की कोई चर्चा नही है। सद् और असद् वस्तु किसी काल विशेष मे रहती ही नहीं, यही बतलाया गया है । “तम” शब्द वाक्य, अचित् समष्टि अर्थ, एक दूसरी श्रुति में इस प्रकार बतलाया गया है- “अव्यक्त अक्षर में लीन हो जाता है, अक्षर तम में लीन हो जाता है, तम परमात्मा से एकीभूत हो जाता है” इत्यादि । यदि कहो कि-“‘तम’ शब्द से अचित् समिष्ट रूप प्रकृति की सूक्ष्मावस्था बतलाई गई है, यह बात तो यथार्थ है, परन्तु “मायां तु प्रकृतिं विद्यात् ” इस वाक्य से “माया” शब्द वाक्य अनिर्वचनीय ही ज्ञात होता है। “यह कथन असंगत है, क्योंकि-माया शब्द की अनिर्वच- नीयता का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता। यदि कहो कि-माया शब्द मिथ्या का पर्यायवाची है, इसलिए अनिर्वचनीय है, सो भी नहीं हो सकता - सभी जगह माया शब्द मिथ्या बोधक नहीं है, असुर, राक्षस, शस्त्र आदि में भी माया शब्द का प्रयोग देखा जाता है - जैसे कि- “शीघ्रगामी सुदर्शन द्वारा प्रह्लाद की देह रक्षा के लिए, शंबरासुर के हजारों माया (असुर) एक एक करके नष्ट कर दिये गए ”। इससे ज्ञात