श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७६ ) होता है कि—आश्चर्य कर वस्तु सृष्टि "माया" शब्द वाच्यार्थ है, मिथ्या वस्तु नहीं। विचित्र सृष्टि कारिणी प्रकृति के लिये प्रायः माया शब्द का प्रयोग किया गया है। "मायी परमेश्वर इसी के द्वारा जगत की सृष्टि करता है, तथा जीव इससे आबद्ध है" इस वाक्य से माया शब्द वाच्य प्रकृति की विचित्र सृष्टि कारिता प्रतीत होती है। परमपुरुष परमात्मा माया संबद्ध होने से मायी कहे गये हैं, अज्ञ होने से उन्हें मायी नहीं कहा गया है। जीव में, माया शक्ति का संकोच बतलाया है। "तस्मिंश्चान्यो—" "अनादि माया सुप्तो—" 'इन्द्रोमायाभि०' इत्यादि वाक्यो में माया शब्द परमेश्वर की शक्ति वैचित्र्य का ही वाचक है। इसीलिए परमेश्वर को भूरित्वष्टैव राजति" कहा गया है, यदि माया शब्द मिथ्यावाची होता तो उक्त वाक्य के स्थान पर "मिथ्याभूतः कश्चित् विराजते" कहा जाता। मम माया दुरत्यया" इस गीता वाक्य में भी "गुणमयी" पद से उसी त्रिगुणात्मिका प्रकृति का उल्लेख किया गया है। इस से ज्ञात होता है कि—कोई भी श्रुति सदसद् अनिर्वचनीया माया का समर्थन नही करती। नाप्यैक्योपदेशानुपपत्त्या; नहि "तत्त्वमसि" इति जीवपरयो- रैक्योपदेशे सति सर्वज्ञेसत्यसंकल्पेसकलजगत्सर्गस्थितिविनाश हेतुभूते तच्छब्दावगते प्रकृतेब्रह्मणि, विरुद्धज्ञानपरिकल्पनाहेतु भूता कादाचिदप्यनुपपत्तिर्दृश्यते। ऐक्योपदेशस्तु "त्वं" शब्देनापि जीव शरीरकस्य ब्रह्मणएवाभिधानादुपपन्नतरः। "अनेन जीवेना- त्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपेव्याकरवाणि" इति सर्वस्य वस्तुनः परमात्मपर्यन्तस्यैव हि नामरूपभाक्त्वमुक्तम् । अतो न ब्रह्माज्ञान परिकल्पनम्। इतिहासपुराणयोरपि न ब्रह्माज्ञानवादः क्वचिदपि दृश्यते । श्रुति प्रतिपाद्य ऐक्योपदेश से भी ब्रह्माज्ञान कल्पना समझ में नहीं आती। "तत्त्वमसि" जीव परमात्मा के ऐक्योपदेश के प्रसंग में सर्वज्ञ, सत्य संकल्प, जगत् की सृष्टि स्थिति संहार के कारण परब्रह्म ही "तत्" शब्द वाच्य है, "त्वं" पद भी जीवशरीरीब्रह्म का ही वाचक है। इसलिए ब्रह्माज्ञान की कल्पना समझ में नहीं आती। "इसजीव में प्रवेश ankurnagpal108@gmail.com