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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १८५ ) उन पूर्वावस्थाओं का उत्तरोतरावस्थाओं में स्मरण नहीं रहता इसलिए उसके लिए सदा "नास्ति" शब्द का प्रयोग होता है। "पृथिवी घटरूपता करती है" इत्यादि श्लोक में उक्त उपलब्धि की बात ही कही गई है। जो लोग अपने कर्म के अनुसार देह मनुष्यादि देह प्राप्त करके विश्चित आत्म- स्वरूप का असंदिग्ध रूप से साक्षात्कार करते हैं, वे ही अपनी भोग्य वस्तुओं को प्रतिक्षण परिवर्तनशील देख पाते हैं, अर्थात् अनुभव करते हैं। इस प्रकार कभी भी अचित् वस्तु "अस्ति" शब्द वाच्य, आदि मध्य अन्तहीन, सदा एक रूप देखी गई है क्या ? तो यही कहना होगा कि वह वस्तु ऐसी है ही नहीं तो देखी कैसे जा सकती है। इससे यह मत स्थिर होता है कि-ज्ञानस्वरूप आत्मा से भिन्न, कोई भी अचिद् वस्तु, कभी किसी भी स्थिति में, "अस्ति" शब्द से उल्लेख्य नहीं है, न हो सकती है। यही बात "तस्मान्न विज्ञानमृते" श्लोक में कही गई है। आत्मा स्वरूपतः एकमात्र ज्ञानस्वरूप होने से, देवादिभेदों से रहित होते हुए भी, देवादिशरीर में प्रविष्ट होने के मूलकारण,विविध कर्मों से ही, देवादिरूप विभिन्न भेद बुद्धि वाला होता है, उस भेद बुद्धि से ही आत्मा में भेद प्रतीति होती है, जो कि स्वाभाविक नहीं होती; यही सब "विज्ञानमेकं" श्लोक में बतलाया गया है। आत्मस्वरूपं तु कर्मरहितं, तत एव मलरूपप्रकृतिस्पर्शरहितम्। ततश्च तत्प्रयुक्त शोकमोहलोभाद्यशेषहेयगुणासंगि, उपचयापचया- नर्हतयैकम्, तत एव सदैकरूपम् । तच्चवासुदेवशरीरमिति तदात्मकं, श्रतदात्मकस्य कस्यचिदप्यभावादित्याह "ज्ञानं विशुद्धम" इति । चिदंशः सदैकरूपतया सर्वदाऽस्ति शब्द वाच्यः। अचिदंशस्तु क्षण- परिणामित्वेन सर्वदानाशनिर्भ इति, सर्वदा नास्ति शब्दाभिधेयः, एवं रूपचिदचिदात्मकं जगद्वासुदेवशरीरं तदात्मकमिति जगद्या- थात्म्यं सम्यगुक्तमित्याह— "सद्भाव एवं" इति । अत्र "सत्यम् असत्यम्" इति "यदस्ति यन्नास्ति" इति प्रक्रान्तस्योपसंहारः । एतत् ज्ञानैकाकारतया समम्, अशब्दगोचरस्वरूपभेदमेवाचिन्मिश्र भुवनाश्रितं देवमनुष्यादि रूपेण सम्यग्व्यवहार्हभेदं यद्वर्त्तते, तत्र

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