श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०४ ) देव आदि वस्तुओ में जो आत्मभाव से अभिमत, देव-मनुष्य, शैल- समुद्र-पृथिवी आदि वस्तु भेद है, वे अपने मूल भूत कर्म के विनष्ट हो जाने पर समाप्त हो जाते हैं। जड़ वस्तु की यह भेद स्थिति सीमित काल वाली होती है, इसीलिए उसे “नास्ति” शब्द से कहा गया है। चिद् वस्तु स्वतः सिद्ध, ज्ञानस्वरूप, सदाविद्यमान रहने वाली होने से “अस्ति” शब्द वाच्य है। प्रतिक्षण में परिवर्त्तनशील, अनियमित स्थिति वाली अचिद् वस्तु की नास्ति शब्द वाच्यता “वस्त्वस्ति किम् ?” इत्यादि श्लोक मे वर्णित है। “आदिमध्यान्तरहित सदा एकसी रहने वाली “अस्ति” शब्द वाच्य वस्तु में, कभी भी “नास्ति” बुद्धि नहीं हो सकती। इसके विपरीत अचिद् वस्तु कही, कभी उक्त रूप में हो नही सकती। ततः किमित्यत्राह ? “यच्चान्यथात्वमिति” यद्वस्तु प्रतिक्षण अन्यथात्वं याति, तदुत्तरोत्तरावस्था प्राप्त्या पूर्वपूर्वावस्थां जहा- तीति तस्यपूर्वावस्थस्योत्तरावस्थायां न प्रतिसंधानमस्ति । अतः सर्वदा तस्य नास्तिशब्दाभिधेयत्वमिति । तथाहि उपलभ्यत इत्याह—“मही घटत्वम्” इति । स्वकर्मणादेव मनुष्यत्वादिभावेन स्तिमितात्म- निश्चयैः स्वभोग्यभूतमचिद्वस्तु प्रतिक्षणमन्यथाभूतमालक्ष्यते अनुभूयत इत्यर्थः । एवं सति किमप्यचिद्वस्तु अस्तिशब्दार्हमादि- मध्यन्तहीनं सततैक रूपमालक्षितमस्ति किं ? न हि अस्तीति अभिप्रायः । यस्मादेवं तस्मात् ज्ञानस्वरूपमात्मव्यतिरिक्तमचिद्वस्तु कदाचित्क्वचित् केवलास्ति शब्दवाच्यं न भवतीत्याह “तस्मान्न- विज्ञानमृते” इति । आत्मा तु सर्वत्र ज्ञानैकाकारतया देवादिभेद प्रत्यनीक स्वरूपोऽपि देवादिशरीर प्रवेश हेतुभूत स्वकृत विविध कर्ममूल देवादिभेदभिन्नात्मबुद्धिभिः तेनतेन रूपेण बहुधाऽनुसंहित इति, तद्भेदानुसंधानं नात्मस्वरूप प्रयुक्तमित्याह “विज्ञानमेकमिति” । यदि कहो कि, उससे क्या होता है ? (उत्तर) अन्यथात्व होता है , अर्थात्—जो वस्तु प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती है, वह उत्तरोत्तर अवस्था को प्राप्त करती हुई पूर्वावस्थाओं को छोड़ती जाती है उसकी ankurnagpal108@gmail.com