भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243

( १६३ ) इस जगत में अस्त्यात्म और नास्त्यात्मक वस्तुएं विष्णु की शरीर स्थानीय होने से विष्ण्वात्मक कही गई है। सत् और असत् दोनो में, असत् रूप का कारण इस प्रकार बतलाया गया है--"ज्ञान स्वरूप भगवान इस जगत् में व्याप्त है।" इस वाक्य में बतलाया गया कि--समस्त जीवों में स्थित भगवान का ज्ञानमय रूप ही स्वाभाविक है, देव मनुष्य आदि वस्तु रूप स्वाभाविक नही है। जड देव मनुष्य शैल समुद्र आदि भेद उन्ही के ज्ञान (इच्छा) से स्वयंभूत है, अर्थात् एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान की जो विविध वैचित्र्य जनक, देव, मनुष्य, शैल, समुद्र आदि आकार स्मारक कर्मराशि है, वही विचित्रता की प्रतीति कराने वाली है। अचिद् वस्तुएं, जीवो के कर्मानुरूप परिणामवाली है, इसलिए "नास्ति" पद वाच्य है। इससे भिन्न चिद् वस्तु "अस्ति" पद वाच्य है यह भी इसी से ज्ञात होता है। यही बात "यदा तु शुद्ध निजरूपि" इत्यादि में विस्तृत रूप से वर्णित है। एकमात्र ज्ञानस्वरूप आत्मा मे जो देव मनुष्य आदि रूप से विविध वैचित्र्य आरोपित होता है, उसका एकमात्र कारण कर्म ही है, उन समस्त कर्मों के क्षीण हो जाने पर, जीवात्मा अपने निर्दोष वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है। उस स्थिति मे, देव आदि रूप में आत्मभाव की कल्पना की मूलकारण कर्मराशि विनष्ट हो जाती है तथा कर्मफलानुयायी भोगप्रद वस्तुभेद भी नही रह जाते। ये देवादिषुवस्तुष्वात्मतयाभिमतेषु भोग्यभूता देवमनुष्यशैला- ब्धिधरादिवस्तुभेदाः, ते तन्मूलभूतकर्मसु विनष्टेषु न भवन्ति इति अचिद् वस्तुनः कादाचित्कावस्थाविशेषयोगितया नास्तिशब्दाभिधे- यत्वं, इतरस्य सर्वदा निजसिद्धज्ञानैकाकारत्वेन अस्तिशब्दाभिधेय- मित्यर्थः । प्रतिक्षणमन्यथाभूततया कादाचित्कावस्था योगिनोऽचिद्- वस्तुनो नास्तिशब्दाभिधेयत्वमेवेत्याह--"वस्त्वस्ति किम् ?" इति । अस्ति शब्दाभिधेयो हि आदिमध्यपर्यन्तहीनः सततैकरूपः पदार्थः तस्य कदाचिदपि नास्ति बुद्ध्यनर्हत्वात् । अचिद्वस्तु किंचिद् क्वचिदपि तथाभूतं न दृष्टचरं ।