श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वभूतात्मा विश्वरूपोयतोऽव्ययः” इति । तदिदंशरीरात्म भावप्रयुक्तं तादात्म्यं सामानाधिकरण्येन व्यपदिश्यते ‘ज्योतींषि विष्णुः’ इति । उक्त तथ्य को ही अन्य श्लोक में बतलाते हैं—“विष्णु के शरीर रूप जल से शैल, सागर आदि युक्त पद्माकार वसुंधरा उत्पन्न हुई” इसमे जल को, विष्णु के शरीररूप से बतलाकर जल के परिणाम रूप इस जगत को भी उनका शरीर स्थानीय कहा गया है । अन्यान्य श्रुतियों मे भी विष्णु को ब्रह्माण्ड की आत्मा बतलाकर ब्रह्माण्ड और विष्णु का सामानाधिकरण्य अभेद बतलाया गया है । ऐसा शरीरात्मभाव ही “ज्योतींषि विष्णुः” से बतलाया गया है । इस शास्त्र में “वह सब उन्ही का शरीर है”—वह सब हरि का तनु है—वह विश्वरूप अव्यय, सभी भूतो के आत्मा हैं ।” इत्यादि वाक्यो से यहीबात कईबार कही गई है । शरीरात्मभाव तादात्म्य ही “ज्योतींषि विष्णुः ” मे सामान्याधिकरण रूप से कहा गया है । अस्त्यात्मकना