श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 241, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८१ )
अपना कर्म ही बतलाया गया है, फिर बाद में “विशुद्ध ज्ञान स्वरूप ब्रह्म के विशुद्ध स्वरूप का निर्देश किया गया है। “मैंने इस प्रकार सद्भाव का निरूपण किया” इत्यादि श्लोकों का तात्पर्य है कि--“ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, बाकी सब मिथ्या है, भुवन आदि समस्त पदार्थों की व्यावहारिक सत्यता है, मैंने तत्त्व की बात तुम्हें बतलादी” ऐसा उपदेश प्रतीत होता है। नैतदेवम्-- अत्र भुवनकोषस्य विस्तीर्णं स्वरूपमुक्त्वा पूर्व- मुक्तं रूपान्तरम् संक्षेपतः “श्रूयतामित्यारभ्याभिधीयते। चिदचिद् मिश्रे जगति चिदंशो वाङ्मनसागोचरस्वसंवेद्य स्वरूपभेदो ज्ञानैकाकारतयाऽस्पृष्टप्राकृतभेदो विनाशीति नास्तिशब्दाभि- धेयः। उभयंतु परब्रह्मरूप वासुदेव शरीरतया तदात्मकमित्येतद्- रूपं संक्षेपेणरत्राभिहितम् । (समाधान) बात ऐसी नहीं है--उक्त प्रकरण में भुवनकोष का विस्तृत स्वरूप बतलाकर, “श्रूयताम्” से उक्त वस्तु का सूक्ष्म रूप संक्षेप रूप से बतलाया गया है उसमें बतलाता गया कि--यह जगत् जडचेतनमय है; इसका चैतन्यांश-वाङ्मनसगोचर, केवल आत्मवेद्य, विविध भागों- वाला, ज्ञानाकार, अविनाशी. “अस्ति” शब्द वाच्य है। जीव के कर्मफल से विविध भेदों और आकारों में परिणत जड अंश, विनाशशील “नास्ति” पदवाच्य है दोनों ही परब्रह्म वासुदेव के शरीर, तदात्मक हैं, ऐसा ही संक्षिप्तरूप से स्वरूप का विवेचन किया गया है। तथापि-- “यदम्बु वैष्णवः कायस्ततोविप्रवसुंधरा, पद्माकारा समुद्भूता पर्वताब्ध्यादिसंयुता।” इत्यम्बुने विष्णोः शरीरत्वेन अम्बुपरिणामभूतं ब्रह्माण्डमपि विष्णोः कायः, तस्य च विष्णुरा- त्मेति सकल श्रुतिगततादात्म्योपदेशोपबृंहणरूपस्य सामानाधिकर- ण्यस्य “ज्योतींषि विष्णुः” इत्यारभ्य वक्ष्यमाणस्य शरीरात्मभाव एव निबंधनमित्याहुः। अस्मिन् शास्त्रे पूर्वमपि एतदसकृदुक्तम्-- “तानि सर्वाणि तद्वपुः”--“सत्सर्वं वै हरेस्तनुः”-- “स एव ankurnagpal108@gmail.com