श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
सर्वभूतात्मा विश्वरूपोयतोऽव्ययः” इति । तदिदंशरीरात्म भावप्रयुक्तं तादात्म्यं सामानाधिकरण्येन व्यपदिश्यते ‘ज्योतींषि विष्णुः’ इति । उक्त तथ्य को ही अन्य श्लोक में बतलाते हैं—“विष्णु के शरीर रूप जल से शैल, सागर आदि युक्त पद्माकार वसुंधरा उत्पन्न हुई” इसमे जल को, विष्णु के शरीररूप से बतलाकर जल के परिणाम रूप इस जगत को भी उनका शरीर स्थानीय कहा गया है । अन्यान्य श्रुतियों मे भी विष्णु को ब्रह्माण्ड की आत्मा बतलाकर ब्रह्माण्ड और विष्णु का सामानाधिकरण्य अभेद बतलाया गया है । ऐसा शरीरात्मभाव ही “ज्योतींषि विष्णुः” से बतलाया गया है । इस शास्त्र में “वह सब उन्ही का शरीर है”—वह सब हरि का तनु है—वह विश्वरूप अव्यय, सभी भूतो के आत्मा हैं ।” इत्यादि वाक्यो से यहीबात कईबार कही गई है । शरीरात्मभाव तादात्म्य ही “ज्योतींषि विष्णुः ” मे सामान्याधिकरण रूप से कहा गया है । अस्त्यात्मकना
( १६३ ) इस जगत में अस्त्यात्म और नास्त्यात्मक वस्तुएं विष्णु की शरीर स्थानीय होने से विष्ण्वात्मक कही गई है। सत् और असत् दोनो में, असत् रूप का कारण इस प्रकार बतलाया गया है--"ज्ञान स्वरूप भगवान इस जगत् में व्याप्त है।" इस वाक्य में बतलाया गया कि--समस्त जीवों में स्थित भगवान का ज्ञानमय रूप ही स्वाभाविक है, देव मनुष्य आदि वस्तु रूप स्वाभाविक नही है। जड देव मनुष्य शैल समुद्र आदि भेद उन्ही के ज्ञान (इच्छा) से स्वयंभूत है, अर्थात् एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान की जो विविध वैचित्र्य जनक, देव, मनुष्य, शैल, समुद्र आदि आकार स्मारक कर्मराशि है, वही विचित्रता की प्रतीति कराने वाली है। अचिद् वस्तुएं, जीवो के कर्मानुरूप परिणामवाली है, इसलिए "नास्ति" पद वाच्य है। इससे भिन्न चिद् वस्तु "अस्ति" पद वाच्य है यह भी इसी से ज्ञात होता है। यही बात "यदा तु शुद्ध निजरूपि" इत्यादि में विस्तृत रूप से वर्णित है। एकमात्र ज्ञानस्वरूप आत्मा मे जो देव मनुष्य आदि रूप से विविध वैचित्र्य आरोपित होता है, उसका एकमात्र कारण कर्म ही है, उन समस्त कर्मों के क्षीण हो जाने पर, जीवात्मा अपने निर्दोष वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है। उस स्थिति मे, देव आदि रूप में आत्मभाव की कल्पना की मूलकारण कर्मराशि विनष्ट हो जाती है तथा कर्मफलानुयायी भोगप्रद वस्तुभेद भी नही रह जाते। ये देवादिषुवस्तुष्वात्मतयाभिमतेषु भोग्यभूता देवमनुष्यशैला- ब्धिधरादिवस्तुभेदाः, ते तन्मूलभूतकर्मसु विनष्टेषु न भवन्ति इति अचिद् वस्तुनः कादाचित्कावस्थाविशेषयोगितया नास्तिशब्दाभिधे- यत्वं, इतरस्य सर्वदा निजसिद्धज्ञानैकाकारत्वेन अस्तिशब्दाभिधेय- मित्यर्थः । प्रतिक्षणमन्यथाभूततया कादाचित्कावस्था योगिनोऽचिद्- वस्तुनो नास्तिशब्दाभिधेयत्वमेवेत्याह--"वस्त्वस्ति किम् ?" इति । अस्ति शब्दाभिधेयो हि आदिमध्यपर्यन्तहीनः सततैकरूपः पदार्थः तस्य कदाचिदपि नास्ति बुद्ध्यनर्हत्वात् । अचिद्वस्तु किंचिद् क्वचिदपि तथाभूतं न दृष्टचरं ।
( १०४ ) देव आदि वस्तुओ में जो आत्मभाव से अभिमत, देव-मनुष्य, शैल- समुद्र-पृथिवी आदि वस्तु भेद है, वे अपने मूल भूत कर्म के विनष्ट हो जाने पर समाप्त हो जाते हैं। जड़ वस्तु की यह भेद स्थिति सीमित काल वाली होती है, इसीलिए उसे “नास्ति” शब्द से कहा गया है। चिद् वस्तु स्वतः सिद्ध, ज्ञानस्वरूप, सदाविद्यमान रहने वाली होने से “अस्ति” शब्द वाच्य है। प्रतिक्षण में परिवर्त्तनशील, अनियमित स्थिति वाली अचिद् वस्तु की नास्ति शब्द वाच्यता “वस्त्वस्ति किम् ?” इत्यादि श्लोक मे वर्णित है। “आदिमध्यान्तरहित सदा एकसी रहने वाली “अस्ति” शब्द वाच्य वस्तु में, कभी भी “नास्ति” बुद्धि नहीं हो सकती। इसके विपरीत अचिद् वस्तु कही, कभी उक्त रूप में हो नही सकती। ततः किमित्यत्राह ? “यच्चान्यथात्वमिति” यद्वस्तु प्रतिक्षण अन्यथात्वं याति, तदुत्तरोत्तरावस्था प्राप्त्या पूर्वपूर्वावस्थां जहा- तीति तस्यपूर्वावस्थस्योत्तरावस्थायां न प्रतिसंधानमस्ति । अतः सर्वदा तस्य नास्तिशब्दाभिधेयत्वमिति । तथाहि उपलभ्यत इत्याह—“मही घटत्वम्” इति । स्वकर्मणादेव मनुष्यत्वादिभावेन स्तिमितात्म- निश्चयैः स्वभोग्यभूतमचिद्वस्तु प्रतिक्षणमन्यथाभूतमालक्ष्यते अनुभूयत इत्यर्थः । एवं सति किमप्यचिद्वस्तु अस्तिशब्दार्हमादि- मध्यन्तहीनं सततैक रूपमालक्षितमस्ति किं ? न हि अस्तीति अभिप्रायः । यस्मादेवं तस्मात् ज्ञानस्वरूपमात्मव्यतिरिक्तमचिद्वस्तु कदाचित्क्वचित् केवलास्ति शब्दवाच्यं न भवतीत्याह “तस्मान्न- विज्ञानमृते” इति । आत्मा तु सर्वत्र ज्ञानैकाकारतया देवादिभेद प्रत्यनीक स्वरूपोऽपि देवादिशरीर प्रवेश हेतुभूत स्वकृत विविध कर्ममूल देवादिभेदभिन्नात्मबुद्धिभिः तेनतेन रूपेण बहुधाऽनुसंहित इति, तद्भेदानुसंधानं नात्मस्वरूप प्रयुक्तमित्याह “विज्ञानमेकमिति” । यदि कहो कि, उससे क्या होता है ? (उत्तर) अन्यथात्व होता है , अर्थात्—जो वस्तु प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती है, वह उत्तरोत्तर अवस्था को प्राप्त करती हुई पूर्वावस्थाओं को छोड़ती जाती है उसकी ankurnagpal108@gmail.com
( १८५ ) उन पूर्वावस्थाओं का उत्तरोतरावस्थाओं में स्मरण नहीं रहता इसलिए उसके लिए सदा "नास्ति" शब्द का प्रयोग होता है। "पृथिवी घटरूपता करती है" इत्यादि श्लोक में उक्त उपलब्धि की बात ही कही गई है। जो लोग अपने कर्म के अनुसार देह मनुष्यादि देह प्राप्त करके विश्चित आत्म- स्वरूप का असंदिग्ध रूप से साक्षात्कार करते हैं, वे ही अपनी भोग्य वस्तुओं को प्रतिक्षण परिवर्तनशील देख पाते हैं, अर्थात् अनुभव करते हैं। इस प्रकार कभी भी अचित् वस्तु "अस्ति" शब्द वाच्य, आदि मध्य अन्तहीन, सदा एक रूप देखी गई है क्या ? तो यही कहना होगा कि वह वस्तु ऐसी है ही नहीं तो देखी कैसे जा सकती है। इससे यह मत स्थिर होता है कि-ज्ञानस्वरूप आत्मा से भिन्न, कोई भी अचिद् वस्तु, कभी किसी भी स्थिति में, "अस्ति" शब्द से उल्लेख्य नहीं है, न हो सकती है। यही बात "तस्मान्न विज्ञानमृते" श्लोक में कही गई है। आत्मा स्वरूपतः एकमात्र ज्ञानस्वरूप होने से, देवादिभेदों से रहित होते हुए भी, देवादिशरीर में प्रविष्ट होने के मूलकारण,विविध कर्मों से ही, देवादिरूप विभिन्न भेद बुद्धि वाला होता है, उस भेद बुद्धि से ही आत्मा में भेद प्रतीति होती है, जो कि स्वाभाविक नहीं होती; यही सब "विज्ञानमेकं" श्लोक में बतलाया गया है। आत्मस्वरूपं तु कर्मरहितं, तत एव मलरूपप्रकृतिस्पर्शरहितम्। ततश्च तत्प्रयुक्त शोकमोहलोभाद्यशेषहेयगुणासंगि, उपचयापचया- नर्हतयैकम्, तत एव सदैकरूपम् । तच्चवासुदेवशरीरमिति तदात्मकं, श्रतदात्मकस्य कस्यचिदप्यभावादित्याह "ज्ञानं विशुद्धम" इति । चिदंशः सदैकरूपतया सर्वदाऽस्ति शब्द वाच्यः। अचिदंशस्तु क्षण- परिणामित्वेन सर्वदानाशनिर्भ इति, सर्वदा नास्ति शब्दाभिधेयः, एवं रूपचिदचिदात्मकं जगद्वासुदेवशरीरं तदात्मकमिति जगद्या- थात्म्यं सम्यगुक्तमित्याह— "सद्भाव एवं" इति । अत्र "सत्यम् असत्यम्" इति "यदस्ति यन्नास्ति" इति प्रक्रान्तस्योपसंहारः । एतत् ज्ञानैकाकारतया समम्, अशब्दगोचरस्वरूपभेदमेवाचिन्मिश्र भुवनाश्रितं देवमनुष्यादि रूपेण सम्यग्व्यवहार्हभेदं यद्वर्त्तते, तत्र
( १८६ ) हेतुः कर्मैवेति उक्तमित्याह--"एतत्तु यत्" इति । तदेव विवृणोति -"यज्ञः पशुः" इति, जगद्याथात्म्य ज्ञानप्रयोजनं मोक्षोपायत- नमित्याह "यच्चैतत्" इति । आत्मा का स्वरूप कर्म रहित है, इसलिए वह मलरूप प्रकृति के स्पर्श से भी रहित है; कर्म और प्रकृति से अस्पृष्ट होने से ही वह, शोक- मोह-लोभ आदि निकृष्ट गुणों के संपर्क से रहित, उपचय अपचय आदि अवस्थाओं से रहित, सदा एक रूप रहता है। ऐसा आत्मा ही, वासुदेव का शरीर स्थानीय होने से वासुदेवात्मक है, जगत् में वासुदेव से भिन्न कुछ भी नही है, यही तथ्य "ज्ञानंविशुद्ध" वाक्य में निहित है। चिदंश सदा एक रूप होने से, सदा "अस्ति" शब्द वाच्य है। अचिदंश, क्षणभंगुर होने से नाशवान होने से "नास्ति" शब्दाभिधेय है। ऐसा जडचेतनमय यह साराजगत वासुदेव का शरीर स्थानीय तदात्मक है; यही जगत का यथार्थ तत्त्व है। "सद्भाव एवम्" वाक्य में यही बात बतलाई गई है। यहाँ "सत्यम् असत्यम्" इत्यादि पद, पूर्वोक्त "यदस्ति यत्रास्ति" पदों के उपसंहार ही है। चैतन्य ज्ञानाकार अशब्द, अगोचर स्वरूप से मिलकर, यह जडमय जगत, भुवनाश्रित देव-मनुष्यादि रूपों से व्यवहार्य भेदों वाला होता है, इस मिश्रण का हेतु भी कर्म ही है-यही बात "एतत्तूयत्" वाक्य में बतलाई गई है। इसी का विवेचन "यज्ञःपशुः" इत्यादि में किया गया है। जगत के यथार्थ तत्त्व को जानकर, मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए "यच्चैतत्" वाक्य इसी को बतलाता है। अत्र निर्विशेषेपरब्रह्मणि तदाश्रये सदसदनिर्वचनीयं चाज्ञाने, जगतस्तत्कल्पितत्वे वाऽनुगुणं किंचिदपि पदं न दूष्यते अस्ति नास्ति शब्दाभिधेयं चिदचिदात्मकं कृत्स्नंजगत् परमस्यपरेशस्यपरस्यै- ब्रह्मणोः विष्णोः कायत्वेन तदात्मकम् । ज्ञानैकाकारस्यात्मनो- देवादिविविधाकारानुभवेऽचित्परिणामे च हेतुर्वस्तुयाथात्म्यज्ञान- ankurnagpal108@gmail.com
( १५७ ) विरोधी क्षेत्रज्ञानां कर्मैवेति प्रतिपादनात् अस्तिनास्तिसत्यासत्यं शब्दानां च सदसदनिर्वचनीयवस्त्वभिधानासामर्थ्याच्च नास्त्यसत्य शब्दावस्तिसत्यशब्द विरोधिनौ। अतश्च ताभ्यां असत्वं हि प्रतीयते, नानिर्वचनीयत्वम् । उक्त प्रसंग में एक भी ऐसा पद नहीं है, जिससे परब्रह्म का निर्विशेष रूप, उसमें सदसदनिर्वचनीय अज्ञान की सत्ता जगत की मिथ्यात्व आदि की कल्पना की गई हो, अपितु इसमें तो स्पष्ट कहा गया कि-अस्ति-नास्ति शब्दों से प्रतिपादित जडचेतन सारा जगत, परात्पर परमेश्वर ब्रह्म विष्णु का शरीर एवं स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप आत्मा की देव मनुष्य आदि आकारों की प्रतीति और अचित् परिणाम भी, वस्तु के यथार्थ ज्ञान के विरोधी, जीव के शुभाशुभ कर्म ही हैं। अस्ति-नास्ति, सत्य-असत्य आदि शब्दों में भी सद्-असद् अनिर्वचनीय वस्तु के बोधन का सामर्थ्य नहीं है। नास्ति और असत्य शब्द केवल, अस्ति और सत्य शब्दों का विरुद्धार्थ मात्र प्रकाशन करते हैं। इन दो शब्दों से असत्ता मात्र प्रतीत होती है, अनिर्वचनीयता नहीं । अत्र चाचिद्वस्तुनि नास्त्यसत्यशब्दौ न तुच्छत्वमिथ्यात्वपरौ प्रयुक्तौ, अपितु विनाशित्वपरौ। “वस्त्वस्ति किम्” महीघटत्वम् “इत्यत्रापि विनाशित्वमेव हि उपपादितम्, न निष्प्रमाणकत्वम्, ज्ञानवाध्यत्वंवा। एकेनाकारेणैकस्मिन् कालेऽनुभूतस्य कालान्तरे- परिणामविशेषेणान्यथोपलब्ध्वा नास्ति त्वोपपादनात् । तुच्छत्वं हि प्रमाणसंबंधानर्हत्वम् । बाधोऽपि यद्देशकालादिसंबंधितया नास्तीत्युपलब्धिः, न तु कालान्तरे, श्रनुभूतस्य कालान्तरे परि- णामादिना नास्तित्युपलब्धिः कालभेदेन विरोधाभावात् । अतो न मिथ्यात्वम् । इस प्रसंग में, अचिद् वस्तु के लिए प्रयुक्त नास्ति और असत्य शब्द तुच्छता और मिथ्यात्व के द्योतक नहीं है अपितु विनाशिता के वाचक हैं। “वस्त्वस्ति किम्’-मही घटत्वम् वाक्य भी, जड पदार्थ की ध्वंशशीलता के ही प्रतिपादक हैं। निष्प्रमाणकता या ज्ञान वाध्यता के नहीं। ankurnagpal108@gmail.com
( १८८ ) एक समय मे जो वस्तु जिस प्रकार की दीखती है वही वस्तु विकारशील होने से कालान्तर में दूसरे प्रकार की दीखती है, इसी अन्यथा भाव को, उक्त प्रसंग मे नास्ति शब्द से कहा गया है। किसी भी प्रमाण से सिद्ध न होनी वाली वस्तुस्थिति को तुच्छता, तथा जो वस्तु जिस स्थान और काल में अस्ति बोधक हो वही वस्तु उसी स्थान में नास्ति बोधक हो जाय, उसे वाध्य कहते है। परिणामादि द्वारा जो कालान्तर में नास्ति बोधक होती है उसे बाध नहीं कहते, क्यों कि-विभिन्न काल में एक ही वस्तु के अस्तित्व और नास्तित्व में किसी प्रकार का विरोध नही होता। इसलिए उक्त वाक्य से भी अचिद् वस्तु का मिथ्यात्व सिद्ध नही होता । एतदुक्तं भवति--ज्ञानस्वरूपमात्मवस्तु आदिमध्यपर्यन्तहीनं सष्टतैकस्वरूपमिति स्वत एव सदास्तिशब्दवाच्यम् । अचेतनं तु क्षेत्रज्ञ भोग्यभूतं तत्कर्मानुगुणपरिणामि विनाशीति सर्वंदा नास्त्यर्थ- गर्भमिति नास्त्यसत्यशब्दाभिधेयम्, इति । यथोक्तः——“यत्तु कालान्तरेणापिनान्यसंज्ञामुपैति वै, परिणामादिसंभूतां तद्वस्तु नृप तच्च किम्। अनाशीपरमार्थश्च प्राज्ञैरभ्युपगम्यते, त्ततुनास्ति न संदेहोनाशिद्रव्योपपादितम् ।” कथन यह है कि-ज्ञानस्वरूप आत्मा, आदि मध्य अन्त रहित, सदा एक रूप में रहने वाला होने से “अस्ति” शब्द वाच्य है। जड पदार्थ, क्षेत्रज्ञ जीव के कर्मानुसार उसी के भोग के लिए, नामरूप से परिणत, विनाशोन्मुख होने से नकारात्मक ही हैं, इसीलिए उन्हें नास्ति और असत्य शब्दों से उल्लेख किया जाता है। जैसा कि कहा भी है-“जो कालान्तर में भी, परिणाम आदि जन्य नामान्तर को प्राप्त नहीं होते वे ही वास्तविक सत्य हैं, पर जगत में कोई ऐसी वस्तु-है क्या ? महात्मा लोग अविनाशी वस्तु को ही परमार्थ मानते हैं, जड़ पदार्थ में ऐसा कोई वस्तु नहीं है जिसे अविनाशी कहा जा सके, इसलिए ऐसी कोई भी वस्तु परमार्थ नामक, इस जगत में नहीं है यह निःसंशय बात है ।” देशकालकर्मविशेषापेक्षया अस्तित्वनास्तित्वयोगिनिवस्तुनि केवलास्ति बुद्धि बोध्यत्वमपरमार्थ इत्युक्तम् । आत्मन एव केवला- ankurnagpal108@gmail.com
( १८६ ) स्ति बुद्धि बोध्यत्वमिति स परमार्थ इत्युक्तम्। श्रोतुश्च मैत्रेयस्य— “विष्ण्वाधारं यथा चैतत् त्रैलोक्यं समवस्थितं परमार्थश्च मे प्रोक्तो यथाज्ञानं प्रधानतः ।” इत्यनुभाषणाच्च, “ज्योतिषि विष्णु” इत्यादि सामानाधिकरण्यस्याऽत्मशरीरभाव एव निबंधनम् । चिदचिद् वस्तुनोश्चास्तिनास्ति शब्दप्रयोग निबन्धनम् ज्ञानस्यकर्म निमित्त स्वाभाविक रूपत्वेन न प्राधान्यम्, अचिद्वस्तुनश्च तत्कर्मनिमित्त परिणामित्वेनाप्राधान्यमिति प्रतीयते । देश काल या क्रिया विशेष में जिसके अस्तित्व और नास्तित्व का का व्यवहार होता है, वह केवल “अस्ति” बुद्धि के साथ-साथ परमार्थ भी है। श्रोता मैत्रेय ने उपदेश श्रवण के बाद कहा कि-यह सारी त्रिलोकी भगवान विष्णु में स्थित है हमारी बुद्धि के अनुसार जगत् की यही परमा- र्थता आपने कही। “इस वाक्य से ज्ञात होता है कि—ज्योति और विष्णु का जो अभेद दिखलाया गया है उसमें शरीर शरीरी संबंध ही निहित है। चित् और जड वस्तु में जो अस्ति नास्ति शब्द का प्रयोग होता है, उसमें अकर्मनिमित्तक ज्ञान के वास्तविक रूप का चिन्तन ही कारण है। अचित् वस्तु, ज्ञान साध्यकर्म का ही परिणाम है, इसलिए ज्ञान की अपेक्षा उसकी अप्रधानता प्रतीत होती है। यदुक्तं — निर्विशेषब्रह्मविज्ञानादेवाविद्यानिवृत्ति वदंति श्रुतयः इति । तदसत्—“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं, आदित्यवर्णं- तमसः परस्तात्—तमेवविद्वानमृत इह भवति—नान्यःपंथा विद्यतेऽयनाय”, सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि, “न तस्येशे कश्चन् तस्यनाम महद्यश.”, य एनं विदुरमृतास्तेभवंति “इत्या- द्यनेक वाक्यविरोधात् । ब्रह्मणः सविशेषत्वादेव सर्वाण्यपि वाक्यानि सविशेषज्ञानादेव मोक्षं वदंति । शोधक वाक्यान्यपि सविशेषमेव ब्रह्मप्रतिपादयंतीत्युक्तम् । जो यह कहा कि—“निर्विशेष ब्रह्म ज्ञान से ही अविद्या की निवृत्ति का श्रुतियों में उपदेश है”, सो असंगत बात है—“आदित्यवर्ण सूर्य की
( १६० ) तरह स्वप्रकाश, अज्ञानान्धकार से अतीत उस महान् पुरुष को जानकर यहीं अमरता मिलती है, उसके पास पहुँचने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है"—"विद्युत के समान प्रकाशमान उस पुरुष से समस्त निमेष उत्पन्न हुए हैं” उसका शासक कोई नहीं है, उसका नाम ही महान यश है— “जो इसे जानता है, वह मुक्त हो जाता है।” इत्यादि अनेक श्रुतियों में निर्विशेष के विपरीत वर्णन मिलता है। परब्रह्म को सविशेष मानकर ही समस्त वाक्य सविशेष ब्रह्म ज्ञान से मोक्ष बतलाते हैं। जीव के अज्ञान को दूर करने वाले शोधक ( सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म आदि ) वाक्य भी सविशेष ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। तत्त्वमस्यादि वाक्येषु सामानाधिकरण्यं न निर्विशेषवस्त्वैक्य- परम्, तत्त्वंपदयोः सविशेषब्रह्माभिधायित्वात्। तत्पदंहि सर्वज्ञं सत्य संकल्पं जगत् कारणं ब्रह्म परामृशति—"तदैक्षत् बहुस्याम्" इत्यांदिषु तस्यैव प्रकृतत्वात्। तत् सामानाधिकरएं त्वं पदं च अचिद्विशिष्टजीवशरीरकंब्रह्म प्रतिपाद्यति, प्रकारद्वयाव- स्थितैकवस्तुपरत्वात् सामानाधिकरण्यस्य । प्रकारद्वय परित्यागे प्रवृत्ति निवृत्त भेदासंभवेन सामानाधिकरण्यमेव परित्यक्तं स्यात्, द्वयोः पदयोः लक्षणा च । “
( १६१ )
बहुस्यां इत्यादि उसी की प्रकृति के वाचक हैं । “तत्” का सामानाधिकरण्य “त्वं” पद भी अचित् विशिष्ट जीव शरीरी ब्रह्म का प्रतिपादक है । विभिन्न प्रकार के दो पदार्थों की एकार्थ बोधकता को ही सामानाधिकरण्य कहते हैं । तत् और त्वं पद में यदि प्रकार गत भेद नहीं मानेंगे तो, प्रवृत्ति निमित्तकता न होगी और भी सामानाधिकरण्य भी छोड़ना होगा, तथा दोनों पदों में लक्षणा (गौणार्थ) करनी पड़ेगी । “यह वही देवदत्त है” इस सुस्पष्ट वाक्य में भी लक्षणा नहीं की जाती, क्यों कि भूत और वर्त्तमान काल में प्रतीतित एक ही व्यक्ति तो है, वह भिन्न स्थान में स्थित देखा गया, पर एक ही समय में तो नहीं देखा गया, जिससे संशय हो सके । विभिन्न काल में दृष्ट होने से, संशय हो ही नहीं सकता । “तत्” पद का यदि निर्विशेष अर्थ करेंगे तो “तदैक्षत बहुस्यां” इस उपक्रम श्रुति से विरुद्धता होगी । एक विज्ञान से सर्व विज्ञान वाली प्रतिज्ञा भी संगत न होगी । समस्त दोष रहित, कल्याण गुण संपन्न, सर्वज्ञ ज्ञान स्वरूप ब्रह्म में अज्ञान और अज्ञान जन्य दोष भी संलग्न होंगे । यदि कहो कि-तत् त्वं पदों का सामानाधिकरण्य, एकत्व बोधक नहीं, बाधार्थक है; तो तत् त्वं पद के सर्वाधिष्ठान भूत परब्रह्म और जीव के, जीव भाव की निवृत्ति के लिए लक्षणा करनी पड़ेगी, तथा सामानाधिकरण्य के कथित नियम का भी उल्लंघन होगा, साथ ही प्रकरण विरोध आदि दोष होंगे । इयांस्तु विशेष:—नेदं रजतमितिवदप्रतिपन्नस्यैव वाधस्यागत्या परिकल्पनम्, तत्पदेनाधिष्ठानातिरेकिधर्मानुपस्थापनेन वाधानु- पत्तिश्च । अधिष्ठानंतु प्राक्तिरोहितस्वरूपं तत्पदेनोपस्थाप्यत इति चेन्न, प्रागाधिष्ठानाप्रकाशे तदाश्रय भ्रमबाधयोरसंभवात् । भ्रमाश्रयमधिष्ठानमतिरोहितमिति चेत्, तदेवाधिष्ठान स्वरूपं भ्रमविरोधीति तत्प्रकाशे सुतरां न तदाश्रय भ्रमबाधौ । अतोऽधि- ष्ठानातिरेकि परमार्थिकधर्मतत्तिरोधानानभ्युपगमे भ्रांतिबाधौ दुरुपपादौ । अधिष्ठाने हि पुरुषमात्राकारे प्रतीयमाने तदति- रेकिणि पारमार्थिके राजत्वे तिरोहिते सत्येव व्याधात्वभ्रमः । राज- त्वोपदेशेन च तन्निवृत्तिर्भवति, नाधिष्ठानमात्रोपदेशेन, तस्य प्रकाशमानत्वेनानुपदेश्यत्वात् भ्रमानुपमर्दित्वाच्च ।
( १६२ ) एक विशेषता यह होगी कि-“यह रजत नही है” इस बाध्य प्रतीति की तरह तत् त्वं पदों मे किसी प्रकार की बाधा न होते हुए भी (अपने मत के प्रतिपादन के लिए) जबरन बाधा की परिकल्पना करनी पड़ेगी । तत् पद से जिस चैतन्याधिष्ठान की प्रतीति होती है, उसमें उससे भिन्न धर्म की उपस्थापना करने से बाधा उत्पन्न भी नही होती । यदि कहो कि-चैतन्याधिष्ठान के प्रथम अज्ञान तिरोहित रहता है, बाद मे तत् पद से वह प्रकट हो जाता है; सो ऐसा नही है, बाधा के पूर्व यदि अधिष्ठान प्रकाशित न रहेगा तो, आधार रहित भ्रम और बाधा दोनों हो नही सकते । यदि कहो कि भ्रमाश्रय अधिष्ठान अतिरोहित रहता है (केवल बाधा का आश्रय ही आवृत रहता है) सो भी असंभव है, जब अधिष्ठान का स्वरूप ही भ्रम का विरोधी है तो वह अधिष्ठान के प्रकाशित स्वरूप के समक्ष टिक भी कैसे सकता है । इससे सिद्ध होता है, कि भ्रम और बाधा अधिष्ठान आश्रित नही हो सकते । उक्त वाक्य में अधिष्ठान के अतिरिक्त किसी पारमार्थिक धर्म और उस धर्म के तिरोधान को माने बिना भ्रम और बाधा का उपपादन करना सहज नही है । पुरुष आकार वाले अधिष्ठान से भिन्न वास्तविक राजत्व के छिपे रहने पर ही बाध्यत्व भ्रम होता है। राजत्व के उपदेश से ही उस भ्रम की निवृत्ति होती है। केवल अधिष्ठान मात्र के उपदेश से नही होती क्योंकि-अधिष्ठान तो प्रकाशित रहता ही है, उसके उपदेश की अपेक्षा ही क्या' है उससे भ्रम की निवृत्ति हो भी नही सकती । जीवशरीर जगत्कारण ब्रह्मपरत्वे मुख्यवृत्तं पदद्वयं, प्रकार द्वयविशिष्टैकवस्तुप्रतिपादनेन सामानाधिकरण्य च सिद्धम् । निरस्त निखिलदोषस्यसमस्तकल्याणगुणात्मकस्य ब्रह्मणो जीवान्तर्यामित्व- मप्यैश्वर्यमपरं प्रतिपादितं भवति । उपक्रमानुकूलता च । एक- विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपत्तिश्च, सूक्ष्मचिद्वस्तुशरीरस्यैव ब्रह्मणः स्थूलचिदचिद्वस्तुशरीरत्वेन कार्यत्वात् “तमीश्वराणां परममहेश्वरम्” पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयतो” अपहत पाप्मा... सत्यकामसत्यसंकल्पः” इत्यादि श्रुत्यंतरा विरोधश्च । ankurnagpal108@gmail.com
( १६३ ) जीव शरीरी, जगत के कारण परब्रह्म के मुख्यार्थ बोधक “तत्” और “त्वं” दो पद हैं, एक ही विशिष्ट वस्तु दो प्रकारों से कही गई है, यही इसका सिद्ध सामानाधिकरण्य है। समस्त दोष रहित कल्याणगुणा- कर परब्रह्म की जीवान्तर्यामिता भी एक ऐश्वर्य है, उसका भी प्रतिपादन किया गया है ऐसा मानने से ही उक्त प्रसंग का उपक्रम अनुकूल हो सकता है तथा एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा भी संगत हो सकती है। सूक्ष्म जड़ चेतन वस्तु जैसे ब्रह्म का शरीर है स्थूल, जड़, चेतन भी उसी प्रकार ब्रह्म का शरीर है, क्योंकि स्थूल, सूक्ष्म वस्तु का ही कार्य रूप है। “ईश्वर सर्वश्रेष्ठ महेश्वर हैं” “परब्रह्म की अनेक शक्तियां प्रसिद्ध हैं, वह निष्पाप, सत्यकाम, सत्यसंकल्प है” इत्यादि श्रुतियाँ भी उक्त मान्यता से अविरुद्ध हैं। ‘तत्त्वमसि” इत्यत्रोद्देश्योपादेयविभागः कथमितिचेत् नात्र- किंचिदुद्दिश्य किमपि विधीयते, ”ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्” इत्यनेनैव प्राप्तत्वात्। अप्राप्ते हि शास्त्रमर्थवत्। इदं सर्वमिति सजीवं जगन्निर्दिश्य ऐतदात्म्यमिति तस्यैषआत्मेति तत्र प्रतिपादित तत्र च हेतुरुक्तः- “सन्मूलास्सौम्येमास्सर्वाः प्रजास्सदायतनास्सत्प्रतिष्ठाः” इति, “सर्वं खल्विदंब्रह्म तज्जलानितिशान्तः” इतिवत् । यदि कहो कि-ऐसा मानने से “तत्त्वमसि” में उद्देश्य, विधेय का विभाग कैसे होगा? सो यहाँ किसी के उद्देश्य से किसी की विधि नहीं की गई है, “यह सब कुछ आत्म्य है” इस वाक्य से उक्त बात की पुष्टि होती है। अप्राप्त विषय का प्रतिपादन करना ही शास्त्र का प्रयोजन होता है। “इदं शरीरम्” से सजीव जगत का निर्देश करके ‘ऐतदात्म्यं’ से ब्रह्म को उसका आत्मा बतलाया गया है। “यह सब कुछ ब्रह्म स्वरूप है, सब कुछ उसी से उत्पन्न, स्थित और विलीन है, उसी की शांतभाव से उपासना करो” इस वाक्य में जैसे-साधक के शांतभाव अवलंबन के लिए, ब्रह्म का सर्वमय भाव हेतु रूप से बतलाया गया है, वैसे ही वहीं- “हे सौम्य ! सद् ब्रह्म ही समस्त जायमान पदार्थों का मूल आश्रय और विलय स्थान है” इस वाक्य से हेतु द्वारा पूर्व विहित ब्रह्मात्मभाव का समर्थन किया गया है। ankurnagpal108@gmail.com
( १६४ ) तथा श्रुत्यन्तराणि च ब्रह्मणस्तद्व्यतिरिक्तस्य चिदचिद्वस्तु- नश्च शरीरात्मभावमेवतादात्म्यं वदंति—“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानांसर्वात्मा-“यः पृथिव्यांनिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी अन्तरो यमयति स त आत्मा ऽन्तर्याम्यमृतः”—“य आत्मनि तिष्ठन् नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्य आत्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मा अंतर्याम्यमृतः”—“यः पृथिवीमन्तरे संचरन्” इत्यारभ्य यस्यमृत्युः शरीरम्, यं मृत्युनंवेद, एष सर्व भूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनुप्रविश्य सच्चत्यच्चाभवत् इत्यादीनि । तथा अन्य श्रुतियां भी ब्रह्मातिरिक्त चित्जडात्मक वस्तु के साथ ब्रह्म का शरीर शरीरी भाव रूप तादात्म्य बतलाती है—“सर्वात्मा परमेश्वर अंतर्यामी रूप से जगत् का शासन करते हैं-“जो पृथिवी में स्थित पृथिवी से भिन्न है, जिन्हें पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी ही जिनका शरीर है; जो अंतर्यामी रूप से पृथिवी का सयमन करते है, वही अमृत अंतर्यामी तेरे आत्मा है। “जो आत्मा में स्थित आत्मा से भिन्न हैं, आत्मा जिन्हें नहीं जानता, आत्मा जिनका शरीर है, जो अंतर्यामी होकर आत्मा का संयमन करते है, वही अमृत अंतर्यामी तेरे आत्मा हैं, जो कि पृथिवी में संचरण करते हैं”—यहाँ से प्रारम्भ करके-“मृत्यु जिनका शरीर है, मृत्यु जिन्हें नहीं जानता, वह अंतर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक मात्र नारायण हैं”—“वह भूतों की सृष्टि करके उनमें प्रविष्ट हो गए तथा कार्य कारण रूप से प्रकट हुए’, इत्यादि । अत्रापि “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकर- वाणि”इति ब्रह्मात्मकजीवानुप्रवेशेनैव सर्वेषां वस्तुत्वं शब्दवाच्यत्वं च प्रतिपादितम् । “तदनु प्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् ‘ इत्यनेनैका- र्थ्याज्जीवस्यापि ब्रह्मात्मकत्वं ब्रह्मानुप्रवेशादेवेत्यवगम्यते । अतश्चिच- दश्चिदात्मकस्य सर्वस्यवस्तुजातस्यब्रह्मतादात्म्यात्मशरीरभावादेवेत्व-
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वगम्यते । तस्मात् ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यकृत्स्नस्यतच्छरोरतवेनैव वस्तुत्वात्तस्य प्रतिपादकोऽपि शब्दस्तत्पर्यन्तमेव स्वार्थमभिदधाति । अतः सर्वशब्दानां लोकव्युत्पत्यवगत तत्तत्पदार्थविशिष्ट ब्रह्माभि- धायित्वसिद्धमिति "ऐतदात्म्यमिदं सर्वं" इति प्रतिज्ञातार्थस्य "तत्त्वमसि" इति सामानाधिकरण्येन विशेष उपसंहारः ।
यहाँ भी-"इस जीव में आत्मरूप से प्रविष्ट होकर नाम और रूप का विस्तार करूँ" इस वाक्य में ब्रह्मात्मक जीव के अन्तः करण के प्रवेश से ही सभी वस्तुओं का अस्तित्व तथा शब्दवाच्यता बतलाई गई है। "सत् च त्यत् च अभवत्" इस श्रुति के साथ उक्त श्रुति का अर्थसाम्य, इसी अर्थ में होता है। जीव में ब्रह्म के अनुप्रवेश से ज्ञात होता है कि- जीव ब्रह्मात्मक है। तथा यह भी ज्ञात होता है कि-चित् जड सब कुछ ब्रह्म का शरीर है एवं ब्रह्म उन सब का आत्मा है, इस शरीरात्मभाव से ही उनका तादात्म्य प्रतीत होता है। ब्रह्म से भिन्न सब कुछ उसका शरीर है, इसीलिए उनकी सत्ता है उनके प्रति- पादक वाक्य उक्त अर्थ के ही प्रतिपादक हैं, ऐसा मानना चाहिए। लौकिक व्यवहारानुयायी व्युत्पत्ति के अनुसार लौकिक पदार्थ बोधक शब्द तद्विशिष्ट ब्रह्म के ही प्रतिपादक होंगे। "ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्" श्रुति से जो अर्थ प्रतिज्ञात होता हैं, "तत्त्वमसि "वाक्य में सामानाधि- करण्य रूप विशेषण-विशेष्य भाव से उसी का उपसंहार हुआ है।
अतोनिर्विशेषवस्त्वैक्यवादिनो, भेदाभेद वादिन केवल भेद वादिनश्च वैयधिकरण्येन सामानाधिकरण्येन च ब्रह्मात्मभावोपदेशाः सर्वे परित्यक्ताः स्युः । एकस्मिन् वस्तुनि कस्य तादात्म्यमुपदिश्यते ? तस्यैवेति चेत्, 'तत्त्व वाक्येनैवावगतमिति न तादात्म्योपदेशा- वसेयमस्ति किंचित् । कल्पित निरसनमिति चेत्, तन्न सामानाधि- करण्यतादात्म्योपदेशावसेयमित्युक्तम् । सामानाधिकरण्यं तु ब्रह्मणि प्रकारद्वयप्रतिपादनेन् विरोधमेवाऽवहेत् । भेदाभेदवादे तु ब्रह्मण्ये-
( १६६ ) वोपाधिसंसर्गात् तत्प्रयुक्ता जीवगतादोषा ब्रह्मण्येव प्रादुःष्यु- रिति निरस्तनिखिलदोषकल्याणगुणात्मकब्रह्मात्मभावोपदेशा हि विरोधादेव परित्यक्तास्स्युः । स्वाभाविक भेदाभेदवादेऽपि ब्रह्मणस्स्वत एव जीवभावाभ्युपगमात् गुणवद्दोषाश्च स्वाभाविका भवेयुरिति निर्दोषब्रह्मतादात्म्योपदेशो विरुद्ध एव । केवल भेदवादिनां चात्यन्तभिन्नयोः केनापि प्रकारेणैक्यासंभवादेव ब्रह्मात्मभावोपदेशा न संभवंतीति सर्ववेदांत परित्यागस्स्यात् । स्वयं श्रुति ने ही जब, ब्रह्म को शरीरी तथा जगत को उसका शरीर बतलाया है, तब चाहे सामानाधिकरण्यभाव से हों या वैधिकरण्य भाव से हो, सारे ही ब्रह्मात्मभाव के उपदेश, निर्विशेषवस्त्वैक्यवादी, भेदाभेदवादी और केवल भेदवादी, इन सभी के लिए त्याज्य है (अर्थात् तीनों ही वाद उन उपदेश वाक्यों का सांमजस्य नही कर पाते) जग विचार करें-एक ही (अद्वैत) वस्तु मे किसके तादात्म्य की बात कही जा सकती है ? यदि उसी एक के ही तादात्म्य को मानें सो तो ब्रह्म के स्वरूप बोधक “सत्यं ज्ञानमनंत ब्रह्म ”इत्यादि वाक्यो से ही ज्ञात है, पुनः तादात्म्योपदेश फिर निष्प्रयोजन सिद्ध होगा । अज्ञानकल्पित भेद के निराकरण के लिए तादाम्योपदेश किया गया है, ऐसा भी नही कह सकते, क्योंकि-सामानाधिकरण्य या तादात्म्योपदेश से कल्पित भेद का निराकरण संभव नही है। सामानाधिकरण्य तो ब्रह्म संभाव्य दो प्रकार के प्रतिपादन संबंधी विरोध का परिहार करता है । जो भेदाभेदवादी ब्रह्म में उपाधिसंबंध बतलाते है और उस उपाधि से ही जीव में जीवत्व की उपस्थिति स्वीकारते है तब तादात्म्य संबंध मानने से जीवगत कामादि दोष भी ब्रह्म में संक्रामित होंगे । समस्त दोष रहित कल्याण गुणात्मक ब्रह्मात्म भावोपदेश उक्त (औपाधिकभेदाभेद वाद) मत से विरुद्ध ही पड़ते हैं । अतएव उक्त मत से परित्यक्त है । जो भेदाभेदवादी, ब्रह्म के जीवभाव को स्वाभाविक मानते है, तो मानो वे जीवगत गुण और दोष दोनों को ही स्वाभाविक मानते ankurnagpal108@gmail.com
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है, ऐसे सदोष जीव के साथ, निर्दोष ब्रह्म का तादात्म्योपदेश सर्वथा विरुद्ध है । जो केवल भेदवादी हैं, उनके मत से तो अत्यंत भिन्न तत्त्व जीव और ब्रह्म के तादात्म्य का कोई प्रश्न ही नहीं हैं, उसमें तो ब्रह्मात्मभावो- पदेश संभव ही नहीं है । अतएव तादात्म्यभाव संबंधी सारे ही वेदांत वाक्य इन लोगों के मत से परित्यक्त हैं । निखिलोपनिषत्प्रसिद्धं कृत्स्नस्यब्रह्मशरीरभावमातिष्ठमानैः कृत्स्नस्य ब्रह्मात्मभावोपदेशास्सर्वे सम्यगुपपादिता भवति । जातिगुणयोरिव द्रव्याणामपि शरीरभावेन विशेषणत्वेन "गौरश्वो- मनुष्योदेवोजातः पुरुषः कर्मभि." इति सामानाधिकरण्यं लोक- वेदयोर्मुख्यमेव दृष्टचरम् । जातिगुणयोरपि द्रव्यप्रकारत्वमेव “षण्डो गौ” शुक्लः पट.” इति सामानाधिकरण्यनिबन्धनम्- मनुष्यत्वादिविशिष्टपिण्डानाम्प्यात्मनः प्रकारतयैव पदार्थत्वात् “मनुष्यः पुरुषः षण्डो योषिदात्मजात.” इति सामानाधिकरण्यं सर्वत्रानुगतमिति प्रकारत्वमेव सामानाधिकरण्यनिबन्धनम्, न परस्परव्यावृत्ता जात्यादयः । स्वनिष्ठानामेव हि द्रव्याणां कदा- चित् क्वचिद् द्रव्यविशेषणत्वे मत्वर्थीय प्रत्ययोदृष्टः “दण्डी कुण्डली” इति, न पृथक् प्रतिपत्तिस्थित्यनर्हाणां द्रव्याणां, तेषां विशेषणत्वं सामानाधिकरण्यावमेयमेव । जो लोग सभी उपनिषदों में प्रसिद्ध समस्त वस्तुओं को ब्रह्म का शरीर मानते हैं, उनके मत में ब्रह्मात्मभावोपदेश सही रूप में संगत होते हैं। मनुष्य आदि जाति और शुक्लता आदि गुण जैसे विशेषण हैं, वैसे ही सारे पदार्थ शरीर रूप से आत्मा के विशेषण हो सकते हैं। "कर्मानुसार आत्मा, गाय घोड़ा, देव, मनुष्य आदि रूपों से होता है" ऐसा सामाना- धिकरण्यघटित प्रयोग, लोक व्यवहार और वेद प्रयोग, सभी जगह मुख्य रूप से प्रयुक्त होता है "सांड़ गाय" "श्वेत वस्त्र" इत्यादि में जो
( १६८ ) षण्डत्व जाति और शुक्लतागुण, गो और वस्त्र के विशेषण रूप से प्रयुक्त होते हैं वह भी सामानाधिकरण्य के नियम से ही होते हैं। मनुष्य आदि जाति विशिष्ट देह पिण्ड भी आत्मा के प्रकार या विशेषण ही हैं। “आत्मा मनुष्य पुरुष षण्ड और स्त्री रूप से हुआ” इत्यादि वाक्यों में किया गया आत्मा और देह पिण्ड का सामानाधिकरण्य व्यवहार, प्रकार रूपी सामानाधिकरण्य संबंधी है। परस्परव्यावृत्त जातिगुण संबंधी नहीं है। कहीं कही समस्त द्रव्य विशेषण रूप से अन्य द्रव्य के आश्रित होकर मत्वर्थीय प्रत्यय के सहयोग से प्रयुक्त होते हैं, जैसे कि—“दण्डी कुण्डली” इत्यादि। स्वतंत्रभाव से अवस्थित स्वतंत्रभाव से विभिन्न आकारों में प्रतीत द्रव्यों की विशेषणता सामानाधिकरण्य से ही व्यवस्थापित होती है। यदि “गौरश्वो मनुष्यो देवः पुरुषो योषित् षण्ड आत्मा कर्मभिः जातः” इत्यत्र “षण्डो मुण्डो गौः शुक्ल पटः “कृष्ण पटः “इति जाति गुणवदात्मप्रकारत्वं मनुष्यादिशरीराणामिष्यते, तर्हि जाति व्यक्त्योरिव प्रकारप्रकारिणोः शरीरात्मनोरपि नियमेन सह प्रति- पत्तिः स्यात्, न चैवं दृश्यते । नहि नियमेन गोत्वादिवदात्माश्रयत यैवाऽत्मना सह मनुष्यादिशरीरं पश्यंति। अतो “मनुष्य आत्मा” इति सामानाधिकरण्यं लाक्षणिकमेव। नैतदेवम्, मनुष्यादि शरीराणां अपि आत्मैकाश्रयत्वम्, तदेक प्रयोजनत्वं, तत्प्रकारत्वं च जात्यादि तुल्यम् । आत्मैकाश्रयत्वं आत्मविश्लेषे शरीरस्य विनाशादवगम्यते। आत्मैकप्रयोजनत्वं च तत्कर्मफल भोगार्थ तयैव सद्भावात् । तत्प्रकारत्वमपि “देवो मनुष्यः” इत्यात्म विशेषणतयैत प्रतीतेः । एतदेव हि गवादि शब्दानां व्यक्ति पर्यन्तत्वे हेतुः। एतस्स्वभावविरहादेव दंडकुंडलादीनां विशेषणत्वे “दंडी कुंडली” इति मत्वर्थीय प्रत्ययः । देवमनुष्यादि पिंडानामात्मैका- श्रयत्वतदेकप्रयोजनत्वतत्प्रकारत्व स्वभावात् “देवो मनुष्य आत्मा” इति लोकवेदयोः सामानाधिकरण्येन व्यवहारः जाति- व्यक्त्योर्नियमेन सह प्रतीतिरुभयोश्चाक्षुषत्वात्। आत्मनस्त्वचक्षुषत्वा- ankurnagpal108@gmail.com
( १६६ ) च्चक्षुषा शरीरग्रहणवेलायामात्मानं गृह्यते । पृथग्ग्रहण योग्यस्य प्रकारतैकस्वरूपत्वं दुर्घटमिति मा वोचः जात्यादिवत् तदेकाश्रयत्व- तदेकप्रयोजनत्वतद्विशेषणत्वैः शरीरस्यापि तत्प्रकारतैक स्वभाव- त्वावगमात् । सहोपलम्भनियमस्त्वेकसामग्रीवेद्यत्वनिबंधन इत्युक्तम् । यथा चक्षुषा पृथिव्यादेर्गंधरसादिसंबंधित्वं स्वाभा- विकमपि न गृह्यते, एवं चक्षुषा गृह्यमाणं शरीरात्मप्रकारतैक- स्वभावमपि न तया गृह्यते आत्मग्रहणे चक्षुषः सामर्थ्याभावात् नैतावताशरीरस्य तत् प्रकारत्वस्वभावविरहः । तत्प्रकारतैकस्व- भावत्वमेव सामानाधिकरण्य निबन्धनं, आत्मप्रकारतया प्रतिपादन समर्थस्तु शब्दस्तथैव प्रकारतया प्रतिपादयति । आशंका होती है कि— 'गो, अश्व, मनुष्य, देव, स्त्री, पुरुष, षण्ड आदि आत्मा कर्मों से होते हैं" इस वाक्य में "षण्ड मुण्ड गाय" शुक्ल पट “कृष्ण पट" आदि जाति गुण की तरह, यदि मनुष्य आदि शरीर की प्रकारता मानी जाय तो, विशेषण-विशेष्य भावापन्न मनुष्यत्व आदि जाति और मनुष्य आदि व्यक्ति की तरह, प्रकार शरीर और प्रकारी आत्मा की सह प्रतिपत्ति (एक साथ प्रतीति) होने लगेगी । जो कि कहीं भी दृष्टिगत नहीं होती । गोत्व आदि जाति विशिष्ट रूप में जैसे- गो आदि के शरीर का व्यवहार होता है, वैसे मनुष्य आदि के शरीर को कोई, कभी आत्मनिष्ठ मानकर आत्मा से अभिन्न रूप से व्यवहार नहीं करता । इसलिए 'मनुष्य आत्मा है" ऐसा सामानाधिकरण्य (आत्मा शरीर का अभेद व्यवहार) लाक्षणिक (गौण) है । (समाधान) यह बात ऐसी नहीं है; जाति और गुण की तरह मनुष्यादि शरीर भी एकमात्र आत्माश्रित, आत्मप्रयोजनीय और आत्मा के प्रकार मात्र हैं । मनुष्यादि शरीर आत्माश्रित हैं, ऐसा, आत्मा के विश्लेष होने पर शरीर के विनाश से ज्ञात होता है। आत्मकृति विशेष कर्मों के भोग के लिए ही शरीर की सृष्टि या अस्तित्व होता है, यही शरीर की आत्मैक प्रयोजनीयता है। देव मनुष्य आदि आत्मा के विशेषणों से शरीर की प्रकारता प्रतीत होती है । गो आदि शब्द केवल आत्मा के ही बोधक नहीं, व्यक्ति बोधक भी हैं। इसमें उक्त तीनों ही हेतु हैं।
( २०० ) ऐसा सम्बन्ध न होने से, दंड कुंडल आदि पद, विशेषण होते हुए भी, मत्वर्थीय प्रत्यय के योग से दंडी कुंडली रूप विशेषण-विशेष्य भाव के प्रयोग बनते हैं। देव मनुष्य आदि के शरीर स्वभावतः आत्मा के आश्रित, आत्मा के प्रयोजन से प्रयोजित, तथा आत्मा के ही प्रकार होते हैं, इसी- लिये लोक और वेद में देवात्मा, मनुष्य आत्मा आदि सामानाधिकरण्य प्रयोग होते हैं। जाति और व्यक्ति (देह) दोनों का ही चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है, इसीलिए सदा दोनों की एक साथ प्रतीति होती है। आत्मा का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता नहीं, शरीर का ही एकमात्र प्रत्यक्ष होता है (इसीलिए दोनों की सदा पृथक् प्रतीति होती है) पृथक् प्रतीतिगम्य पदार्थों की प्रकारता संभव नहीं होती, ये नहीं कहा जा सकता, क्योंकि-- एकमात्र आत्मा के आश्रित एवं प्रयोजन साधक तथा आत्मा के विशेषण जात्यादि की तरह, शरीर भी आत्मा का स्वाभाविक प्रकार प्रतीत होता है। जहाँ दो का प्रत्यक्ष एक ही कारण से होता है, वहाँ सहोपलम्भ का नियम (एक साथ प्रतीति) होता है ऐसा पहले भी कह चुके हैं। जैसे कि पृथिवी के स्वाभाविक गुण, गंध आदि का, पृथिवी के प्रत्यक्ष काल में, चाक्षुष प्रत्यक्ष नही होता; वैसे ही शरीर आत्मा का विशेषण है, पर शरीर के प्रत्यक्ष के समय, आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि-नेत्रों में आत्मा के प्रत्यक्ष का अभाव है। एक साथ प्रतीति न होने मात्र से, शरीर की स्वाभाविक आत्म प्रकारता का अभाव नहीं हो सकता। आत्म विशेषण होने से ही, शरीर आत्मा का अभेद व्यवहार होता है; शब्द ही शरीर की आत्मविशेषणता का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं, शब्द ही शरीर को आत्मा का प्रकार बतलाता है। ननु च शब्देऽपि व्यवहारे शरीरशब्देनशरीरमात्रं गृह्यत इति नात्मपर्यन्तता शरीर शब्दस्य । नैवम् आत्मप्रकार भूतस्यैव शरीरस्य पदार्थविवेक पदर्शनाय निरूपणान्निष्कर्षशब्दोऽयम्, यथा “गोर्द्रव्यं शुक्लत्वमाकृतिर्गुणः” इत्यादि शब्दाः। (शंका) शब्द व्यवहार में तो शरीर शब्द से केवल देह मात्र का ही बोध होता है, शरीर शब्द का आत्मापर्यन्त बोध तो होता नहीं ? (समाधान) नहीं; शरीर आत्मा का विशेषण है इसीलिये पदार्थ कहलाता है (आत्मा के बिना शरीर का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता) ankurnagpal108@gmail.com
( २०१ ) “शरीर” शब्द आत्मा का ही निष्कर्ष (परिचायक) है, जैसे कि-गोत्व शुक्लता आदि आकृति गुण वाचक शब्द हैं । अतो गवादि शब्दवद्देवमनुष्यादिशब्दा आत्मपर्यन्ताः एवं देवमनुष्यादि पिंडविशिष्टानां जीवानां परमात्मशरीरतया तत्प्रकार- त्वात् जीवात्मवाचिनः शब्दाः परमात्मपर्यन्ताः । अतः परस्य ब्रह्मणः प्रकारतयैव चिदचिद्वस्तुनः पदार्थत्वमिति तत्सामानाधिकरण्येन प्रयोगः । अयमर्थो वेदार्थसंग्रहे समर्थितः । इदमेव शरीरात्मभाव लक्षणं तादात्म्यं “आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च” इति वक्ष्यति; “आत्मेत्येव तु गृह्णीयात्” इति च वाक्यकारः । गो आदि शब्द की तरह देव मनुष्य आदि शब्द आत्मापर्यन्त अर्थ के वाचक हैं । ऐसे ही देव मनुष्य आदि पिण्ड विशिष्ट जीव, परमात्मा के शरीर होने से, उन्हीं के प्रकार हैं इसलिए जीवात्मा वाची शब्द परमात्मा पर्यन्त अर्थ के वाचक हैं परब्रह्म के प्रकार होने से ही चिद् अचिद् वस्तुओं की पदार्थता है, इसीलिए उनका परमात्मा के साथ सामानाधि- करण्य (अभेद सम्बन्ध) भाव से प्रयोग होता है । इस विषय का हमने अपने वेदार्थ संग्रह में समर्थन किया है । इसी शरीरात्मभाव लक्षण तादात्म्य को सूत्रकार “आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयंति च” सूत्र में बतलाते हैं, “आत्मेत्येवतु गृह्णीयात्” ऐसा वाक्यकार का भी कथन है । अत्रेदं तत्त्वम्-अचिद् वस्तुनः, चिद वस्तुनः परस्य च ब्रह्मणो, भोग्यत्वेन, भोक्तृत्वेन, चेशितृत्वेन च स्वरूप विवेकमाहुः काश्चन श्रुतयः “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्त्तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः” “मायां तु प्रकृतिं विद्धि मायिनं तु महेश्वरम्” “क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मा नावीशते देव एकः”, अमृताक्षरं हर इति भोक्ता निर्दिश्यते, प्रधानमात्मनो भोग्यत्वेन, हरतीति हरः। “स कारणं कारणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः”, प्रधानं क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः”, पति विश्वस्यात्मेश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतं”; ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशौ”; नित्यो नित्यानां चेतनः चेतनानां एको ankurnagpal108@gmail.com