श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६४ ) तथा श्रुत्यन्तराणि च ब्रह्मणस्तद्व्यतिरिक्तस्य चिदचिद्वस्तु- नश्च शरीरात्मभावमेवतादात्म्यं वदंति—“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानांसर्वात्मा-“यः पृथिव्यांनिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी अन्तरो यमयति स त आत्मा ऽन्तर्याम्यमृतः”—“य आत्मनि तिष्ठन् नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्य आत्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मा अंतर्याम्यमृतः”—“यः पृथिवीमन्तरे संचरन्” इत्यारभ्य यस्यमृत्युः शरीरम्, यं मृत्युनंवेद, एष सर्व भूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनुप्रविश्य सच्चत्यच्चाभवत् इत्यादीनि । तथा अन्य श्रुतियां भी ब्रह्मातिरिक्त चित्जडात्मक वस्तु के साथ ब्रह्म का शरीर शरीरी भाव रूप तादात्म्य बतलाती है—“सर्वात्मा परमेश्वर अंतर्यामी रूप से जगत् का शासन करते हैं-“जो पृथिवी में स्थित पृथिवी से भिन्न है, जिन्हें पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी ही जिनका शरीर है; जो अंतर्यामी रूप से पृथिवी का सयमन करते है, वही अमृत अंतर्यामी तेरे आत्मा है। “जो आत्मा में स्थित आत्मा से भिन्न हैं, आत्मा जिन्हें नहीं जानता, आत्मा जिनका शरीर है, जो अंतर्यामी होकर आत्मा का संयमन करते है, वही अमृत अंतर्यामी तेरे आत्मा हैं, जो कि पृथिवी में संचरण करते हैं”—यहाँ से प्रारम्भ करके-“मृत्यु जिनका शरीर है, मृत्यु जिन्हें नहीं जानता, वह अंतर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक मात्र नारायण हैं”—“वह भूतों की सृष्टि करके उनमें प्रविष्ट हो गए तथा कार्य कारण रूप से प्रकट हुए’, इत्यादि । अत्रापि “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकर- वाणि”इति ब्रह्मात्मकजीवानुप्रवेशेनैव सर्वेषां वस्तुत्वं शब्दवाच्यत्वं च प्रतिपादितम् । “तदनु प्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् ‘ इत्यनेनैका- र्थ्याज्जीवस्यापि ब्रह्मात्मकत्वं ब्रह्मानुप्रवेशादेवेत्यवगम्यते । अतश्चिच- दश्चिदात्मकस्य सर्वस्यवस्तुजातस्यब्रह्मतादात्म्यात्मशरीरभावादेवेत्व-