श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६५ )
वगम्यते । तस्मात् ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यकृत्स्नस्यतच्छरोरतवेनैव वस्तुत्वात्तस्य प्रतिपादकोऽपि शब्दस्तत्पर्यन्तमेव स्वार्थमभिदधाति । अतः सर्वशब्दानां लोकव्युत्पत्यवगत तत्तत्पदार्थविशिष्ट ब्रह्माभि- धायित्वसिद्धमिति "ऐतदात्म्यमिदं सर्वं" इति प्रतिज्ञातार्थस्य "तत्त्वमसि" इति सामानाधिकरण्येन विशेष उपसंहारः ।
यहाँ भी-"इस जीव में आत्मरूप से प्रविष्ट होकर नाम और रूप का विस्तार करूँ" इस वाक्य में ब्रह्मात्मक जीव के अन्तः करण के प्रवेश से ही सभी वस्तुओं का अस्तित्व तथा शब्दवाच्यता बतलाई गई है। "सत् च त्यत् च अभवत्" इस श्रुति के साथ उक्त श्रुति का अर्थसाम्य, इसी अर्थ में होता है। जीव में ब्रह्म के अनुप्रवेश से ज्ञात होता है कि- जीव ब्रह्मात्मक है। तथा यह भी ज्ञात होता है कि-चित् जड सब कुछ ब्रह्म का शरीर है एवं ब्रह्म उन सब का आत्मा है, इस शरीरात्मभाव से ही उनका तादात्म्य प्रतीत होता है। ब्रह्म से भिन्न सब कुछ उसका शरीर है, इसीलिए उनकी सत्ता है उनके प्रति- पादक वाक्य उक्त अर्थ के ही प्रतिपादक हैं, ऐसा मानना चाहिए। लौकिक व्यवहारानुयायी व्युत्पत्ति के अनुसार लौकिक पदार्थ बोधक शब्द तद्विशिष्ट ब्रह्म के ही प्रतिपादक होंगे। "ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्" श्रुति से जो अर्थ प्रतिज्ञात होता हैं, "तत्त्वमसि "वाक्य में सामानाधि- करण्य रूप विशेषण-विशेष्य भाव से उसी का उपसंहार हुआ है।
अतोनिर्विशेषवस्त्वैक्यवादिनो, भेदाभेद वादिन केवल भेद वादिनश्च वैयधिकरण्येन सामानाधिकरण्येन च ब्रह्मात्मभावोपदेशाः सर्वे परित्यक्ताः स्युः । एकस्मिन् वस्तुनि कस्य तादात्म्यमुपदिश्यते ? तस्यैवेति चेत्, 'तत्त्व वाक्येनैवावगतमिति न तादात्म्योपदेशा- वसेयमस्ति किंचित् । कल्पित निरसनमिति चेत्, तन्न सामानाधि- करण्यतादात्म्योपदेशावसेयमित्युक्तम् । सामानाधिकरण्यं तु ब्रह्मणि प्रकारद्वयप्रतिपादनेन् विरोधमेवाऽवहेत् । भेदाभेदवादे तु ब्रह्मण्ये-