श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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है, ऐसे सदोष जीव के साथ, निर्दोष ब्रह्म का तादात्म्योपदेश सर्वथा विरुद्ध है । जो केवल भेदवादी हैं, उनके मत से तो अत्यंत भिन्न तत्त्व जीव और ब्रह्म के तादात्म्य का कोई प्रश्न ही नहीं हैं, उसमें तो ब्रह्मात्मभावो- पदेश संभव ही नहीं है । अतएव तादात्म्यभाव संबंधी सारे ही वेदांत वाक्य इन लोगों के मत से परित्यक्त हैं । निखिलोपनिषत्प्रसिद्धं कृत्स्नस्यब्रह्मशरीरभावमातिष्ठमानैः कृत्स्नस्य ब्रह्मात्मभावोपदेशास्सर्वे सम्यगुपपादिता भवति । जातिगुणयोरिव द्रव्याणामपि शरीरभावेन विशेषणत्वेन "गौरश्वो- मनुष्योदेवोजातः पुरुषः कर्मभि." इति सामानाधिकरण्यं लोक- वेदयोर्मुख्यमेव दृष्टचरम् । जातिगुणयोरपि द्रव्यप्रकारत्वमेव “षण्डो गौ” शुक्लः पट.” इति सामानाधिकरण्यनिबन्धनम्- मनुष्यत्वादिविशिष्टपिण्डानाम्प्यात्मनः प्रकारतयैव पदार्थत्वात् “मनुष्यः पुरुषः षण्डो योषिदात्मजात.” इति सामानाधिकरण्यं सर्वत्रानुगतमिति प्रकारत्वमेव सामानाधिकरण्यनिबन्धनम्, न परस्परव्यावृत्ता जात्यादयः । स्वनिष्ठानामेव हि द्रव्याणां कदा- चित् क्वचिद् द्रव्यविशेषणत्वे मत्वर्थीय प्रत्ययोदृष्टः “दण्डी कुण्डली” इति, न पृथक् प्रतिपत्तिस्थित्यनर्हाणां द्रव्याणां, तेषां विशेषणत्वं सामानाधिकरण्यावमेयमेव । जो लोग सभी उपनिषदों में प्रसिद्ध समस्त वस्तुओं को ब्रह्म का शरीर मानते हैं, उनके मत में ब्रह्मात्मभावोपदेश सही रूप में संगत होते हैं। मनुष्य आदि जाति और शुक्लता आदि गुण जैसे विशेषण हैं, वैसे ही सारे पदार्थ शरीर रूप से आत्मा के विशेषण हो सकते हैं। "कर्मानुसार आत्मा, गाय घोड़ा, देव, मनुष्य आदि रूपों से होता है" ऐसा सामाना- धिकरण्यघटित प्रयोग, लोक व्यवहार और वेद प्रयोग, सभी जगह मुख्य रूप से प्रयुक्त होता है "सांड़ गाय" "श्वेत वस्त्र" इत्यादि में जो