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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १६८ ) षण्डत्व जाति और शुक्लतागुण, गो और वस्त्र के विशेषण रूप से प्रयुक्त होते हैं वह भी सामानाधिकरण्य के नियम से ही होते हैं। मनुष्य आदि जाति विशिष्ट देह पिण्ड भी आत्मा के प्रकार या विशेषण ही हैं। “आत्मा मनुष्य पुरुष षण्ड और स्त्री रूप से हुआ” इत्यादि वाक्यों में किया गया आत्मा और देह पिण्ड का सामानाधिकरण्य व्यवहार, प्रकार रूपी सामानाधिकरण्य संबंधी है। परस्परव्यावृत्त जातिगुण संबंधी नहीं है। कहीं कही समस्त द्रव्य विशेषण रूप से अन्य द्रव्य के आश्रित होकर मत्वर्थीय प्रत्यय के सहयोग से प्रयुक्त होते हैं, जैसे कि—“दण्डी कुण्डली” इत्यादि। स्वतंत्रभाव से अवस्थित स्वतंत्रभाव से विभिन्न आकारों में प्रतीत द्रव्यों की विशेषणता सामानाधिकरण्य से ही व्यवस्थापित होती है। यदि “गौरश्वो मनुष्यो देवः पुरुषो योषित् षण्ड आत्मा कर्मभिः जातः” इत्यत्र “षण्डो मुण्डो गौः शुक्ल पटः “कृष्ण पटः “इति जाति गुणवदात्मप्रकारत्वं मनुष्यादिशरीराणामिष्यते, तर्हि जाति व्यक्त्योरिव प्रकारप्रकारिणोः शरीरात्मनोरपि नियमेन सह प्रति- पत्तिः स्यात्, न चैवं दृश्यते । नहि नियमेन गोत्वादिवदात्माश्रयत यैवाऽत्मना सह मनुष्यादिशरीरं पश्यंति। अतो “मनुष्य आत्मा” इति सामानाधिकरण्यं लाक्षणिकमेव। नैतदेवम्, मनुष्यादि शरीराणां अपि आत्मैकाश्रयत्वम्, तदेक प्रयोजनत्वं, तत्प्रकारत्वं च जात्यादि तुल्यम् । आत्मैकाश्रयत्वं आत्मविश्लेषे शरीरस्य विनाशादवगम्यते। आत्मैकप्रयोजनत्वं च तत्कर्मफल भोगार्थ तयैव सद्भावात् । तत्प्रकारत्वमपि “देवो मनुष्यः” इत्यात्म विशेषणतयैत प्रतीतेः । एतदेव हि गवादि शब्दानां व्यक्ति पर्यन्तत्वे हेतुः। एतस्स्वभावविरहादेव दंडकुंडलादीनां विशेषणत्वे “दंडी कुंडली” इति मत्वर्थीय प्रत्ययः । देवमनुष्यादि पिंडानामात्मैका- श्रयत्वतदेकप्रयोजनत्वतत्प्रकारत्व स्वभावात् “देवो मनुष्य आत्मा” इति लोकवेदयोः सामानाधिकरण्येन व्यवहारः जाति- व्यक्त्योर्नियमेन सह प्रतीतिरुभयोश्चाक्षुषत्वात्। आत्मनस्त्वचक्षुषत्वा- ankurnagpal108@gmail.com

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