श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६६ ) च्चक्षुषा शरीरग्रहणवेलायामात्मानं गृह्यते । पृथग्ग्रहण योग्यस्य प्रकारतैकस्वरूपत्वं दुर्घटमिति मा वोचः जात्यादिवत् तदेकाश्रयत्व- तदेकप्रयोजनत्वतद्विशेषणत्वैः शरीरस्यापि तत्प्रकारतैक स्वभाव- त्वावगमात् । सहोपलम्भनियमस्त्वेकसामग्रीवेद्यत्वनिबंधन इत्युक्तम् । यथा चक्षुषा पृथिव्यादेर्गंधरसादिसंबंधित्वं स्वाभा- विकमपि न गृह्यते, एवं चक्षुषा गृह्यमाणं शरीरात्मप्रकारतैक- स्वभावमपि न तया गृह्यते आत्मग्रहणे चक्षुषः सामर्थ्याभावात् नैतावताशरीरस्य तत् प्रकारत्वस्वभावविरहः । तत्प्रकारतैकस्व- भावत्वमेव सामानाधिकरण्य निबन्धनं, आत्मप्रकारतया प्रतिपादन समर्थस्तु शब्दस्तथैव प्रकारतया प्रतिपादयति । आशंका होती है कि— 'गो, अश्व, मनुष्य, देव, स्त्री, पुरुष, षण्ड आदि आत्मा कर्मों से होते हैं" इस वाक्य में "षण्ड मुण्ड गाय" शुक्ल पट “कृष्ण पट" आदि जाति गुण की तरह, यदि मनुष्य आदि शरीर की प्रकारता मानी जाय तो, विशेषण-विशेष्य भावापन्न मनुष्यत्व आदि जाति और मनुष्य आदि व्यक्ति की तरह, प्रकार शरीर और प्रकारी आत्मा की सह प्रतिपत्ति (एक साथ प्रतीति) होने लगेगी । जो कि कहीं भी दृष्टिगत नहीं होती । गोत्व आदि जाति विशिष्ट रूप में जैसे- गो आदि के शरीर का व्यवहार होता है, वैसे मनुष्य आदि के शरीर को कोई, कभी आत्मनिष्ठ मानकर आत्मा से अभिन्न रूप से व्यवहार नहीं करता । इसलिए 'मनुष्य आत्मा है" ऐसा सामानाधिकरण्य (आत्मा शरीर का अभेद व्यवहार) लाक्षणिक (गौण) है । (समाधान) यह बात ऐसी नहीं है; जाति और गुण की तरह मनुष्यादि शरीर भी एकमात्र आत्माश्रित, आत्मप्रयोजनीय और आत्मा के प्रकार मात्र हैं । मनुष्यादि शरीर आत्माश्रित हैं, ऐसा, आत्मा के विश्लेष होने पर शरीर के विनाश से ज्ञात होता है। आत्मकृति विशेष कर्मों के भोग के लिए ही शरीर की सृष्टि या अस्तित्व होता है, यही शरीर की आत्मैक प्रयोजनीयता है। देव मनुष्य आदि आत्मा के विशेषणों से शरीर की प्रकारता प्रतीत होती है । गो आदि शब्द केवल आत्मा के ही बोधक नहीं, व्यक्ति बोधक भी हैं। इसमें उक्त तीनों ही हेतु हैं।