भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २०६ ) बहूना यो विदधाति कामान् ", भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा", तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति", पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति", अजामेकां लोहित शुल्क कृष्णां वह्वीं प्रजां जनयंतीं सरूपाम् अजोह्येको जुषमाणोऽ- नुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यो", “समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो अनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानं इति वीतशोकः" इत्याद्याः । यहाँ तत्त्व ये है कि-जगत् में तीन पदार्थ हैं, अचित् (जड़) चित् (जीव) और परब्रह्म । जो कि क्रमशः भोग्य भोक्ता और परिचालक (ईश्वर) है । ऐसा कुछ श्रुतियों ने स्वरूप विभाग किया है-“मायाधीश इसको लेकर ही जगत की सृष्टि करते है, इस जगत में दूसरा आत्मा जीव, माया से सान्नरुद्ध (मायाधीन) है । माया को प्रकृति तथा मायी को महेश्वर जानो । क्षर सब माया है, अक्षर अमृत है एक देव क्षर अक्षर का शासन करते हैं । “अमृताक्षरं हरः" में भोक्ता (जीव) का निर्देश है; जो अपने लिए प्रधान भोग्य माया को हरण अर्थात् आयत्त करता है, वही हर है " वह सबका कारण, देह इन्द्रिय आदि के अधिपति जीव का भी अधिपति है, इसका कोई भी जनक और स्वामी नहीं है । वह प्रधान (माया) क्षेत्रज्ञ (जीव) और गुणों का स्वामी है । वह विश्वपति, आत्मा का ईश्वर, नित्य एक रूप, कल्याणमय और अच्युत है । दो अजन्मा हैं, उसमें एक ज्ञ (परमात्मा) दूसरा अज्ञ (जीव) है, एक ईश दूसरा अनीश है । जो नित्यों का नित्य, चेतनों का चेतन, अकेला ही अनेक कामनाओं का विधान करता है । भोक्ता (जीव) भोग्य जगत प्रेरिता ईश्वर को जानकर ही। उन दोनों में एक सुस्वादु कर्मफल का आस्वाद करता है, दूसरा आस्वाद न करके केवल देखता ही है । जीव अपने से पृथक् और प्रेरक ईश्वर का मनन करके एवं उसका अनुग्रह प्राप्त कर अमृतत्व प्राप्त करता है । अपने अनुरूप अनेक प्रकार की सृष्टि करने वाली, लाल श्वेत, कृष्ण वर्णवाली, जन्म रहित प्रकृति का एक अज (जीव) प्रीति पूर्वक अनुसरण करता है, दूसरा अज (मुक्तात्मा) यथोपयुक्त इसका भोग करके परित्याग कर देता है । जीव, परमात्मा के साथ देह रूप एक ही वृक्ष पर ankurnagpal108@gmail.com