श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०३ ) अवस्थित मोहित होकर शोक दुःख का भोग करता है। भक्तियुक्त जीव जब अन्य परमात्मा का दर्शन करता है, तब वीत शोक होकर उसकी महिमा को प्राप्त करता है।" इत्यादि। स्मृतावपि— "अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा। अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे परां, जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्। सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यांति ममिकाम्, कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्। प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः, भूतग्राममिमंकृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्। मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद् हि परिवर्त्तते। प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्, संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।" इति। जगद् योनिभूतं महत् ब्रह्म मदीयं प्रकृत्याख्यं भूतसूक्ष्मं अचिद् वस्तु यत्, तस्मिंश्चेताख्यं गर्भं यत् संयोजयामि ततो मत्कृतात् चिदचिद् संसर्गात् देवाद स्थावरान्तानामचिन्मिश्राणां सर्वभूतानां संभवो भवतीत्यर्थः। स्मृति में भी ऐसा उल्लेख है—"पंच महाभूत मन, बुद्धि, अहंकार आदि आठ विभागों में विभक्त प्रकृति को मेरी अपरा (बहिरंग) प्रकृति समझो। इस प्रकृति से भिन्न मेरी एक परा प्रकृति भी है जो कि जीव स्वरूपा है, उसी से यह जगत विधृत है। प्रलय के समय समस्त भूत मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं, सृष्टि के आदि में मैं उसे पुनः प्रकट कर देता हूँ। अपनी प्रकृति की सहायता से पुनः पुनः सृष्टि करता हूं, यह सारे भूत समुदाय प्रकृति के वशीभूत रहते हैं। मेरी अध्यक्षता में यह प्रकृति जड़ चेतन सारे जगत का प्रसव करती है, इसी से जगत् का परिचालन होता रहता है। प्रकृति और पुरुष दोनों को ही अनादि समझो। अपने अभिव्यक्ति स्थान महद् ब्रह्म (व्यापक प्रकृति) में मैं गर्भ स्थापन करता हूँ, उसीसे समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।" इत्यादि ankurnagpal108@gmail.com